Monday 16 January 2012

इक्कीसवीं सदी : पहले दशक की लघुकथाएँ


                                            चित्र : बलराम अग्रवाल
दोस्तो, सन् 2003 में अनुभव (डॉ. नरेन्द्र नाथ लाहा), उत्तराधिकारी (सुदर्शन भाटिया), कटाक्ष (किशोर श्रीवास्तव), कदम कदम पर हादसे (जगदीश कश्यप), कीकर के पत्ते (शराफत अली खान), खुलते परिदृश्य (प्रेम विज), नमस्कार प्रजातन्त्र (महेन्द्र राजा), पहाड़ पर कटहल(सुदर्शन वशिष्ठ), पूजा (पृथ्वीराज अरोड़ा), भूखे पेट की डकार (रविशंकर परसाई), मीरा जैन की सौ लघुकथाएँ (मीरा जैन) यह मत पूछो (रूप देवगुण), लघुदंश (प्रद्युम्न भल्ला) तथा लपटें(कहानी+लघुकथा संग्रह:2003) चित्रा मुद्गल कुल 14 संग्रहों की सूची प्राप्त हुई है। इनमें से कदम कदम पर हादसे (जगदीश कश्यप) के बारे में सूचना संदेहास्पद प्रतीत हो रही है। सन् 2004 में  अछूते संदर्भ (कनु  भारतीय), अपना अपना दु:ख (शिवनाथ राय), अपना हाथ जगन्नाथ (सुदर्शन भाटिया), उसी पगडंडी पर पाँव (डॉ. शील कौशिक), एक बार फिर (मनु स्वामी), कड़वे सच (दलीप भाटिया), कर्तव्य-बोध (माणक तुलसीराम गौड़), चन्ना चरनदास (बलराम अग्रवाल:कहानी-लघुकथा संग्रह), ज़ुबैदा (बलराम अग्रवाल), दिन-दहाड़े (सरला अग्रवाल), देन उसकी हमारे लिए (अन्तरा करवड़े), प्रभात की उर्मियाँ (आशा शैली), पोस्टर्स (मनोज सोनकर), बयान (चित्रा मुद्गल), बुढ़ापे की दौलत (मालती वसंत), मुखौटा (डॉ. आभा झा), मुर्दे की लकड़ी (भगवान देव चैतन्य), सच के सिवा (जसवीर चावला), सपनों की उम्र (अशोक मिश्र), सफेद होता खून (डॉ. प्रदीप शर्मा ‘स्नेही’), सागर के मोती (डॉ॰ प्रभाकर शर्मा) कुल 21 संग्रहों की सूची प्राप्त हुई है। इनमें से 2004 में प्रकाशित जितने भी संग्रह मेरे पास उपलब्ध हैं उनमें से प्रस्तुत हैं निम्न लघुकथाएँ—



भिखारी का दान/अशोक मिश्र
सारा दिन भीख माँगने पश्चात उसे आज काफी अच्छी कमाई हो गई थी। उसने सोचा कि काफी दिनों बाद आज अच्छा पैसा मिला है तो वह भरपेट पूड़ी-सब्जी और मिठाई खायेगा।
                                               चित्र : बलराम अग्रवाल
उसने होटल से खरीदकर एक एकांत स्थान पर पूड़ी-सब्जी खाना शुरू ही किया था कि इतने में एक-और बूढ़ा भिखारी आ पहुँचा जो काफी कृशकाय था, बोला—“बेटा, कई दिनों का भूखा हूँ। थोड़ा खाना खिला दे। बड़ा उपकार होगा तेरा।
पहले वाले भिखारी ने अपना पूरा खाना दूसरे बूढ़े भिखारी को दे दिया।
पहला भिखारी आज काफी संतोष महसूस कर रहा था कि भिखारी होने के बावजूद वह किसी को खाना खिला सका।
चेहरे पर उभरे संतोष के भाव से उसकी रही-सही भूख कपूर की भाँति उड़ गई थी।

भ्रष्टाचार/अशोक मिश्र
चारों तरफ फैले और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे भ्रष्टाचार की ओर सरकार का ध्यान गया और उसने भ्रष्टाचार उन्मूलन आयोग बनाकर उसके अध्यक्ष पद का भार एक निहायत ईमानदार और कर्मठ किस्म के अधिकारी को सौंप दिया।
शाम को साहब खाने की मेज पर बैठे हैं—“मैडम, ये दशहरी आम तो बड़े टॉप क्लास के हैं! क्या इन्हें बाज़ार से मँगाया था?
नहीं तो।
फिर इन्हें कौन दे गया?
बड़ा बाबू रामचरण।
अरे, वो तो सस्पेंड है घूस लेने के आरोप में। खबरदार, फिर उससे आम या कोई सामान न लेना।
दूसरे दिन।
अरे, आम आज फिर वही? बड़े टेस्टी हैं। साहब चिंतन में मगन हो गयेआम पच्चीस रुपए किलो…एक टोकरी आम, मतलब दस किलो।
साहब ने तीसरे दिन रामचरण बाबू से आम की बाबत पूछा तो उत्तर मिला—“सरकार, बाग आपका है। सेवा का मौका देते रहें।
ठीक है, ठीक है।
साहब पुन: चिंतन कर फाइल-स्टडी कर रहे हैं और रामचरण बाबू आम पहुँचा रहे हैं। उन्हें आशा है कि एक न एक दिन…।
(सपनों की उम्र:2004 से)

टॉयलेट/डॉ॰ सरला अग्रवाल
                                              चित्र : बलराम अग्रवाल
मम्मी देखो, ये मालती आज फिर हमारे टॉयलेट को गंदा करके गई है। कितनी बदबू आ रही है!! अंकुर ने गुस्से में मम्मी से कहा।
क्यों री मालती, दस बजाकर घर से आती है, फिर भी हमारे टॉयलेट में ही जाती है रोज। कितनी बार तुझे कह दिया कि फ्लश खींच दिया कर और वहीं रखा विम डालकर ब्रश से साफ कर दिया कर।
शर्म से पानी-पानी होती मालती ने घबराहट भरे स्वर में कहा,मालकिन, घर में टॉयलेट कहाँ है? सब बाहर बहते पानी के आसपास बैठेते हैं। मुझे वहाँ जाते लाज आती है। एक दिन पड़ोस के एक मर्द ने मेरा हाथ भी पकड़ लिया था।
तो साफ तो कर सकती है यहाँ का टॉयलेट।
मैं करने लगती हूँ, इतने में ही घर में सभी शोर मचाने, डाँटने लगते हैं। कहकर वह मुँह नीचा करके खड़ी हो गई।
ठीक है, अब से कोई तुझसे कुछ नहीं कहेगा, पर तू पूरी सफाई करके बाहर आना। आकर साबुन से हाथ धोना, फिर कोई काम करना।
माँ, यह बात तो ठीक नहीं लगती। तभी बड़े बेटे ने आकर कहा। वह पीछे खड़ा सब बातें सुन रहा था।
ठीक नहीं लगती तो इनकी बस्ती में दो-चार टॉयलेट खुद बनवा दो, या सुविधा वालों से कहकर ही सही। माँ ने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया।
(दिनदहाड़े:2004 से)

मानदंड/चित्रा मुद्गल
माँ, बेचारी बाई को तुमने उसके कपड़े धोने से क्यों मना कर दिया?
                                             चित्र : बलराम अग्रवाल
मना न करती तो क्या करती?
क्या बात हुई?
महारानी सुबह का चौका-बरतन निबटाने चढ़ी दोपहरी में पधार रही हैं। टोकने पर बिसूरने लगींतीन दिन से नलके में बूँद पानी नहीं टपका। पीने और कपड़े-लत्ते धोने बगल की झोंपड़-पट्टी से भरके लाना पड़ रहा है। इसीलिए देर हो गई…।
हूँअ…
पसीजकर मैंने कह दियाकपड़े-लत्ते यहीं लाकर धो ले, मगर चौका-बासन में अबेर न कर। वही निहाद है, पाँवों को हाथ लगाने दो, फट्ट पहुँचा पकड़ लेंगे। जब देखो, गट्ठर उठाए चली आ रही…
हो सकता है, पानी की दिक्कत अब तक बरकरार हो?
हो तो हो। ठेका ले रखा है रोज़ का? चीकट ओढ़ने-बिछोने, कपड़े-लत्ते हमारे नहानघर में फींचेगी? बाल-बच्चों वाला घर, छूत-पात नहीं लग सकती?
क्यों नहीं लग सकती। एक बात बताओ माँ, छूत आदमी से ज्यादा लगती है या कपड़े लत्तों से?
दोनों से…
तब तो तुम फौरन सावित्रीबाई को चलता करो।
ऊल-जलूल न बक…आसानी से मिलती हैं कामवालियाँ?
सावित्रीबाई की आधी कमर दाद से भरी हुई है, गौर किया तुमने?
चुप रह…तुझसे अकल उधार नहीं लेनी। और सुन, घर-गृहस्थी के मामले में तुझे टाँग अड़ाने की जरूरत नहीं, समझी!
उसने विस्मय से माँ की ओर देखा।
(बयान:2004 से)

Friday 30 December 2011

इक्कीसवीं सदी : पहले दशक की लघुकथाएँ

दोस्तो,
2011 अपना दायित्व निभाकर जा रहा है और 2012 का सूर्य नयी लालिमा से जगत को चमकाने के लिए आने को है। आइए, नवागत का खुले हृदय से स्वागत करें
अनूशहर(जिला:बुलन्दशहर) की एक शाम  चित्र:बलराम अग्रवाल
सन् 2002 में अपनी-अपनी सोच (संतोष गर्ग), अपने आसपास (मनु स्वामी), एक और एकलव्य (मदन लाल वर्मा), कागज़ के रिश्ते (राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी बन्धु), कीलें (कालीचरण प्रेमी)गुस्ताखी माफ (सुदर्शन भाटिया), घोषणापत्र (जीवितराम सेतपाल), छँटता कोहरा (डॉ मिथिलेश कुमारी मिश्र), जब द्रोपदी नंगी नहीं हुई (युगल), पश्चाताप की आग (सुदर्शन भाटिया), बदले हुए शब्द (भारती खुबालकर), ब्लैकबोर्ड (मधुकांत), मीमांसा (मथुरानाथ सिंह रानीपुरी), मेरा शहर और ये दंगे (डॉ॰ शैल रस्तौगी), यथार्थ के साये में (आलोक भारती), यह भी सच है (डॉ॰ शैल रस्तौगी), रोटी का निशान (सुखचैन सिंह भंडारी), लुटेरे छोटे-छोटे (सत्यप्रकाश भारद्वाज), शब्द साक्षी हैं (सतीश राठी), सरोवर में थिरकता सागर (वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज), सॉरी सर! (सुदर्शन भाटिया), सुरंगनी (कृष्णा भटनागर), स्याह सच (हृषीकेश पाठक), हजारों-हजार बीज (भगवान दास वैद्य प्रखर)  कुल 25 संग्रहों की सूची प्राप्त हुई है। इनमें से जितने भी संग्रह मेरे पास उपलब्ध हैं उनमें से प्रस्तुत है एक-एक लघुकथा


चिड़िया/सतीश राठी
उड़ती हुई चिड़िया सेठ करोड़ीमल की खिड़की पर जा बैठी और चहकने लगी। हिसाब-किताब कर रहे सेठ जी को उसका चहकना अपने काम में बाधक लगा। सेठ ने उठकर चिड़िया को उड़ा दिया और खिड़की बंद कर दी।
चिड़िया उड़कर एक कवि के दरवाज़े पर जा बैठी। कवि अपनी कविता रचने के रचनाक्रम में इतना तल्लीन था कि चिड़िया की चहकती हुई दस्तक उसकी तल्लीनता को भंग नहीं कर पाई।
तब चिड़िया उड़कर चित्रकार के कला-कक्ष में जा पहुँची। चित्रकार अपने मन की सारी कुंठाओं को केनवास पर अंकित कर रहा था। उसकी समझ में ही नहीं आया कि चहकती चिड़िया को केनवास के किस कोने पर अंकित करे।
निराश चिड़िया उड़ती हुई एक नेता जी के दरबार में जा पहुँची। नेता जी ने चिड़िया को देखा तो उनकी बाँछें खिल गईं। जेब में हाथ डालकर उन्होंने चुग्गा निकाला और चिड़िया के आगे डाल दिया। चहकती हुई चिड़िया जैसे-ही नेता जी के पास पहुँची, उन्होंने उसे झपट्टा मारकर पकड़ लिया और चिड़िया की गरदन मरोड़ दी।
खानसामे ने उस दिन नेता जी के लिए अव्वल दर्जे का शोरबा बनाया।

Sunday 27 November 2011

हिन्दी लघुकथा : शोध की स्थिति/बलराम अग्रवाल


दोस्तो, डॉ॰ रामकुमार घोटड़ के संपादन में वर्ष 2011 में एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है—‘भारत का हिन्दी लघुकथा संसार। इसके बारे में जनगाथा के जनवरी 2011 अंक में परिचयात्मक टिप्पणी लिखी जा चुकी है। इस पुस्तक के पृष्ठ 160 पर डॉ॰ रामकुमार घोटड़ का एक ब्यौरापरक लेख है—‘भारतीय हिन्दी लघुकथा साहित्य में शोध कार्य। इसे मैं ब्यौरा कह रहा हूँ क्योंकि इसमें दर्ज सूचनाओं के पीछे मुझे डॉ॰ घोटड़ की हिन्दी लघुकथा के लिए कुछ करने की आकांक्षा तो नजर आती है, शोधवृत्ति नहीं। भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में पी-एच॰ डी॰ की उपाधि हेतु नामांकित अथवा पी-एच॰ डी॰ उपाधि से सम्मानित ऐसे सभी विषयों को जिनमें लघुकथा शब्द का प्रयोग हुआ है, सूचीबद्ध करके उन्होंने नि:संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है, परंतु यह शोधपरक नहीं है।
मैं स्वयं पी-एच॰ डी॰ उपाधि हेतु शोधार्थी रहा हूँ। नामांकन से पूर्व मुझे भ्रम था कि मैं शोध करूँगा लेकिन वह मैं कर नहीं पाया। मैंने भी ब्यौरे ही इकट्ठे किए और शोध के नाम पर उन्हें विश्वविद्यालय में जमा करा दिया। नामांकन कराए बिना मैं शायद बेहतर कार्य कर सकता था। मेरे शोध-निदेशक ने, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय के लिपिकों ने, महाविद्यालय के प्रधानाचार्य ने, हिन्दी प्रवक्ताओं ने, यहाँ तक कि चपरासियों ने भी लगातार मुझे जिस दृष्टि से देखा, मैं यही महसूस करता रहा किआब गई, आदर गया, नैनन गया सनेह…। परंतु इस पत्र का विषय यह नहीं है, दूसरा है।

Thursday 3 November 2011

इक्कीसवीं सदी : पहले दशक की लघुकथाएँ : वर्ष 2001/बलराम अग्रवाल

दोस्तो, बीसवीं सदी के प्रारम्भिक पहले वर्ष यानी सन् 2001 में, मेरी जानकारी के अनुसार कुल 10 हिन्दी लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुएअन्यथा (कमल चोपड़ा), अभिमन्यु की जीत (राजेन्द्र वर्मा), इधर उधर से(बीजेन्द्र कुमार जैमिनी) केक्टस (मोइनुद्दीन अतहर), जंगल की आग (सी॰ रा॰ प्रसाद), सच्चा सुख (आशा मेहता), तरकश का आखिरी तीर (अतुल मोहन प्रसाद), दो सौ ग्यारह लघुकथाएँ (उषा जैन शीरीं), राजा नंगा हो गया (सुनीता सिंह) तथा सलीब पर टँगे चेहरे(सुरेन्द्र कुमार अंशुल)। इनमें से मेरे पास पास केवल तीन संग्रह ही उपलब्ध थेअन्यथा, अभिमन्यु की जीत तथा राजा नंगा हो गया। उनमें से प्रस्तुत हैं निम्नलिखित चार लघुकथाएँ

उनकी सज़ा/कमल चोपड़ा
ऐसा नहीं था कि कभी कोई कार नहीं देखी था; पर इतनी लंबी और चमचमाती कार उसने पहली बार देखी थी। उसने कार के चारों तरफ एक चक्कर लगाया तो उसे लगा जैसे वह कार नहीं किसी दूसरे ग्रह से आया कोई जादुई उड़न-खटोला है।
उसने कार पर हाथ फिराया; शीशों और लाइटों को छूकर देखा। उस अजीब-से सुख से उसका मन खुशी से नाच उठा।
ज्योंही उसने कार के दरवाज़े के हैंडिल को खींचा, दरवाज़ा खटाक-से खुल गया। कार का मालिक शायद दरवाज़े को लॉक करना भूल गया था। छोटू को लगा जैसे किसी स्वर्ग का दरवाजा उसके सामने खुला पड़ा है। थोड़ा झिझकते-सहमते हुए वह कार में ड्राइवरवाली सीट पर जा बैठा। अंदर ए॰सी॰ ऑन नहीं था पर ठंडक अभी बाकी थी। उसने इधर-उधर लगे बटनों से छेड़छाड़ शुरू कर दी। स्टीरियो ऑन हुआ तो धीमे, पर इतने मधुर संगीत ने जैसे उसकी सुध-बुध ही हर ली। उसको लगा जैसे वह इस स्वर्ग का बादशाह है।
अचानक उसकी नज़र साइड में लगे कार के शीशे पर पड़ी। उसने देखासामने बिल्डिंग से एक सूट-बूट और काले चश्मेवाला आदमी चला आ रहा है। यह होगा मालिक। वह झट से निकला। दरवाज़ा बंद कर भागने को ही था कि उस आदमी ने उसे पकड़ लिया और तड़ाक से उसके एक थप्पड़ जड़ दिया,क्या चुरा रहा था साले, बोल? क्या चुरा रहा था?
ज्योंही कारवाला आदमी कार के अंदर झांककर देखने लगा कि सारी चीजें सही-सलामत हैं या नहीं, छोटू अपनी बाँह छुड़ाकर दूर जा खड़ा हुआ और ऊँची आवाज़ में बोला,चोर नहीं हूँ मैं…मैं तो यहाँ बैठकर भुने हुए चने बेचता हूँ जहाँ तुमने ये कार खड़ी कर दी। मेरा जो नुकसान हुआ वो…? हम घर के सारे लोग सारा दिन काम करते हैं, तब भी हमारे तो खर्चे पूरे नहीं होते, तुम कार कहाँ से ले आए? मैं तो दो मिनट कार को देख रहा था कि तुमने मुझे थप्पड़ मार दिया! तुम जो सारा दिन इसका मज़ा लेते हो, तुम्हें क्या सज़ा होनी चाहिए?
 (अन्यथा: 2001 से)

Monday 17 October 2011

‘सरस्वती सुमन’ व ‘सादर इंडिया’ के लघुकथा विशेषांक, लघुकथा संग्रह ‘परिवर्तन’ तथा संकलन ‘विगत दशक की पंजाबी लघुकथाएँ’

पत्रिका:सरस्वती सुमन(लघुकथा विशेषांक, सितम्बर 2011), संपादक:कुँवर विक्रमादित्य सिंह, अतिथि संपादक:कृष्ण कुमार यादव, पत्राचार कार्यालय : सारस्वतम्, 1-छिब्बर मार्ग(आर्यनगर), देहरादून-248001(उत्तराखंड)  अंक पर मूल्य अंकित नहीं है।

सरस्वती सुमन के प्रस्तुत लघुकथा विशेषांक में अतिथि संपादक की कलम से… लिखा गया है कि—‘इस अंक हेतु कुल 482 लोगों ने लघुकथाएँ/लेख भिजवाए, पर सभी को शामिल करना हमारे लिए संभव भी न था। इस स्नेह और विश्वास के लिए उन सभी का आभार अवश्य व्यक्त करना चाहूँगा। फिलहाल, 126 लघुकथाओं और 10 सारगर्भित लेखों को समेटे इस अंक में स्थापित एवं नवोदित लघुकथाकारों दोनों को समान रूप से स्थान दिया गया है, आखिर आज के नवोदित ही तो कल के स्थापित होंगे।
तथ्य यह है कि अंक में 126 लघुकथाएँ नहीं, लघुकथाकार(न कि लघु-कथाकार) सम्मिलित हैं और लघुकथाओं की कुल संख्या है276। जब संपादकीय के प्रूफ का यह हाल है तो अंदर की सामग्री के प्रूफ का हाल बताने की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
रचनाकारों को उनके नामों के अनुरूप अकारादि क्रम में स्थान दिया गया है। रचना की स्तरीयता और रचनाकार की वरिष्टतादोनों के दम्भ से बचने का संपादक के पास यह सरलतम अस्त्र है।
रचनाओं और रचनाकारों की गणनात्मक प्रस्तुति के कारण ही नहीं बृहद आकार और ध्यानाकर्षक वज़न के कारण भी इस अंक को लघुकथा महाविशेषांक की संज्ञा दी जा सकती है।
विशेषांक के आवरण पर कलासिद्ध संदीप राशिनकर की कृति का उपयोग किया है। क्या ही अच्छा होता कि उनसे पर्यावरण की बजाय लघुकथा की थीम पर ही चित्र बनवाया जाता।


Tuesday 9 August 2011

चार कश्मीरी लघुकथाएँ

दोस्तो, अपरिहार्य कारणों से जनगाथा के मई, जून व जुलाई 2011 अंक पोस्ट नहीं किये जा सके। कारण दिनांक 7 अगस्त, 2011 को पोस्ट अपने ब्लॉग अपना दौर(http://apnadaur.blogspot.com) में व्यक्त कर चुका हूँ अत: यहाँ भी उसे दोहराने का औचित्य नहीं है। इस बीच कुछ पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक तथा कुछ कथाकारों के लघुकथा संग्रह भी प्राप्त हुए हैं। संबंधित संपादकों व लेखकों से क्षमाप्रार्थी हूँ कि उन पत्रिकाओं-संग्रहों पर अभी तक मैं कुछ नहीं लिख सका। दरअसल, मैं उन्हें पढ़ने का समय न निकाल सका।
आज अपने प्रिय दोस्त डॉ॰ भ॰ प्र॰ निदारिया से मिलने नई दिल्ली के रामाकृष्णापुरम गया था। बाइत्तेफाक़ लंच के समय पहुँचा और वे अपनी सीट पर नहीं मिले। कुछ समय उनके कार्यालय में पड़ी कुर्सियों में से एक में बैठकर इंतजार किया तत्पश्चात बाहर निकल आया। घूमता-घामता पुरानी किताबों की एक दुकान पर जा पहुँचा। वहाँ मेरी नजर भाई जसबीर चावला का लघुकथा संग्रह आतंकवादी(2006), कृष्ण लता यादव  का लघुकथा संग्रह भोर होने तक(2005), युगल के लघुकथा संग्रह गर्म रेत तथा फूलों वाली दूब पर पड़ी। इनमें से प्रथम दो को मैं खरीद लाया, शेष दो मेरे पास पहले से थे। तभी मुझे कश्मीरी की प्रतिनिधि कहानियाँ(सं॰ शिब्बनकृष्ण रैना, संस्करण 1990) भी दिखाई पड़ी। पन्ने पलटे तो उसमें कुछ लघुकथाएँ भी संकलित मिलीं। 45 रुपये छपे मूल्य वाली उस पुस्तक को मैं 25 रुपये देकर खरीद लाया, केवल उन कश्मीरी लघुकथाओं को आप तक पहुँचाने की खातिर। बहुत संभव है कि इन सबको या इनमें से कुछ को किन्हीं सज्जन ने पहले भी कहीं पढ़ रखा हो, लेकिन मेरा साक्षात्कार इनसे पहली बार हुआ है इसलिए इन्हें जनगाथा के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत करने का लोभ संवरण कर नहीं पा रहा हूँ। ये लघुकथाएँ जिनसे मिलने जाने के कारण मिल पाई हैं, जनगाथा का यह अंक उन डॉ॰ निदारिया को ही समर्पित है। प्रस्तुत हैं कश्मीरी भाषा की 4 लघुकथाएँ

॥1॥ राम का नाम/ हरिकृष्ण कौल
                                                  फोटो: आदित्य अग्रवाल
      इन्जेक्शन लग जाने पर उसकी पीड़ा कुछ कम हुई और उसने दाएँ-बाएँ नजर डाली। सभी के चेहरे लटक गये थे।
      पति ने उसके सिर पर हाथ फेरकर कहा—“अब तू भगवान की स्मरण कर, राम का नाम ले।
      पत्नी बिलख पड़ी—“लगता है डॉक्टर ने जवाब दे दिया है। तुम सब शायद मेरे मरने की प्रतीक्षा कर रहे हो।
      पाँच मिनट के लिए मान लो वही बात है। एक-न-एक दिन मरना तो सबको है। और फिर, तुमने अपनी सारी जिम्मेदारियाँ भी तो पूरी कर ली हैं। तुम्हें तो भगवद्भजन से अपार आनन्द मिलता था। याद है, रोज़ दो घण्टे तक कीर्तन-भजन किया करती थीं।
      राम का नाम मैं नहीं लूँगी। मैं मरना नहीं चाहती। और वह सिर पटकने लगी।

Wednesday 27 April 2011

कालीचरण प्रेमी की तीन लघुकथाएँ


॥1॥ पैदाइशी दीवार
फोटो:आदित्य अग्रवाल
ठाकुर साहब के घर औरतों का जमघट था।  ढोलकी की थाप पर लोकगीत गूँज रहे थे। ठाकुर साहब के घर में पहली बार लड़का पैदा हुआ था। अत: हर तरफ हर्षोल्लास का आलम था। पास ही से गुजरती गंगादेई ने यह-सब देखा तो चौखट के अन्दर धँसते हुए पूछा—“अरी चमेली! क्या हुआ है री ठकुराइन को?
फोटो:आदित्य अग्रवाल
अरी कुँअर साहब आए हैं, चमेली खिलकर बोली,बोत सोणी सकल-सूरत है…बिल्कुल ठाकुर साहब पर गए हैं…सपूत हैं एकदम सपूत…
सहसा गंगादेई को ध्यान आया।
अरी, और कुछ सुना है…हरिया चमार की बहू के छोरा पैदा हुआ है या छोरी?
होता क्या, कलुआ हुआ है, हाथ नचाते हुए चमेली बोली,उस करमजले के मारे हरिया फूला फिर रहा है।
अब वे दोनों नाक सिकोड़ने लगी थीं।     
(रूपसिंह चन्देल द्वारा संपादित लघुकथा-संकलन प्रकारांतर(1991) से)

'प्रेमी' हृदय ही बने रहे ‘काली’चरण नहीं बन पाए वह/बलराम अग्रवाल


मौत को धता बताते हुए कैंसर वार्ड में भी लिखते-पढ़ते रहे प्रेमी जी फोटो:बलराम अग्रवाल
15 जुलाई, 1962 को गाजियाबाद(उ॰प्र॰) के गाँव मोरटा के एक निर्धन दलित परिवार में जन्मे कालीचरण ने बेरोजगारी के दिनों में, सम्भवत: बी॰ए॰ पास करने के तुरन्त बाद सन् 1978 में क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट किस्म की किसी प्राइवेट कम्पनी में ज्वाइन कर लिया था। उक्त कम्पनी ने उन्हें अपने बुलन्दशहर कार्यालय का प्रभारी बनाया। वस्तुत: तो कार्यालय नामधारी छोटी-सी वह अंधेरी कोठरी ही उनकी शरणस्थली भी थी। सिवा इस तसल्ली के कि वह नौकरी पा गये थे, कोई अन्य सुख बुलन्दशहर में रहते हुए उन्हें नहीं था। यह नौकरी उन्हें कुछ ही माह खपा पाई, बहुत जल्द छूट गई। स्वभाव से कालीचरण अपने अन्तस तक मृदुल थे और सम्भवत: इसी कारण अपना उपनाम उन्होंने प्रेमी चुना जो उनकी प्रकृति से शतश: मेल खाता था। मैं उन दिनों प्रधान डाकघर, बुलन्दशहर में कार्यरत था। कालीचरण ने किसी दिन शायद वहीं पर मुझसे भेंट की और अपना परिचय दिया। मुझे लगता है कि उन्हीं दिनों उन्होंने लघुकथाएँ लिखना भी प्रारम्भ कर दिया था। ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूँ कि उनकी एक प्रारम्भिक लघुकथा पर मैंने भीष्म साहनी की एक कहानी मेड इन इटली की छाया महसूस की थी। मेरे यह बताने का मन्तव्य न समझकर जगदीश कश्यप ने मिनीयुग के किसी अंक में उनका जिक्र इसी आधार पर चोर लेखक के रूप में कर दिया था। बाद में, बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि यह किस्सा बी॰ ए॰ की कक्षा लेते हुए उनके अध्यापक डॉ॰ कुँअर बेचैन ने किसी दिन सुनाया था जिसे उन्होंने लघुकथा का रूप देकर एक पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया, उन्हें इस किस्से की वास्तविकता का पता नहीं था। कालीचरण प्रेमी की स्पष्टवादिता और स्वीकारोक्ति का यह एक ही प्रसंग नहीं है, अनेक अन्य भी हैं।