'जनगाथा'समकालीन लघुकथा के विचार-पक्ष की अव्यावसायिक मासिक ब्लाग पत्रिका है। कृपया नोट करें कि ‘जनगाथा’ में प्रकाशित—(अ) रचनाओं में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं और वही उनके प्रति जवाबदेह हैं, ब्लागर नहीं। (ब) प्रत्येक रचना के प्रकाशन/प्रसारण का अधिकार संबंधित लेखक के पास सुरक्षित है। लेखक की सहमति/अनुमति प्राप्त किए बिना उसकी किसी रचना या रचना के किसी अंश का किसी भी रूप में प्रयोग कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जाएगा।
उपन्यासकार व कहानीकार विजय ने हिन्दी लघुकथाओं की सम्प्रेषण क्षमता से प्रेरित होकर सन् 2004-05 में लघुकथा लिखना प्रारम्भ किया। अब तक उनकी लघुकथाएँ वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कथाबिंब, हरिगंधा(लघुकथा-विशेषांक), सनद, संरचना(लघुकथा वार्षिकी) आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘जनगाथा’ के जून 2009 अंक में प्रस्तुत हैं उनकी कुछ चर्चित लघुकथाएँ—
आदर्श गाँव
कुछ ही दिनों में गाँव का नक्शा बदल गया। लाला की छोटी-सी दुकान जिसमें जरूरत की हर चीज मौजूद रहती थी, बड़े-से डिपार्टमेंटल-स्टोर में बदल गई। निर्मल सिंह का मुख्य सड़क के साथ खड़ा खोखा जहाँ सर्दियों में चाय और पकौड़े थाल में रखे रहते थे व गर्मियों में हंडिया में मथनी से मथकर लस्सी भी पिला दी जाती थी, वहाँ पक्की दुकान बन गई। चाय-कॉफी की मशीन लग गई और कोल्ड-ड्रिंक के क्रेट्स आने लगे। कंपनी फ्रिज भी लगा गई। मैला राम की पान की टोकरी, जिसमें घर की बनी खैनी भी रहती थी, अब एक दुकान में बदल गई। दुकान में जाने कितनी तरह के शीशे लटके रहने लगे। एक बैंक ने भी अपनी छोटी-सी शाखा पंचायत की इमारत में खोल दी थी। सरपंच के दस्तखत करते ही उधार मिल जाता था, आसान किश्तों पर।
किसान और उसके बीवी-बच्चे, जो कभी नीम और कभी बबूल की डालियाँ तोड़कर दातुन कर लेते थे, अब हर महीने टी वी पर विज्ञापन देखकर अपना ब्रश और पेस्ट बदलने लगे। बिजली की सप्लाई अच्छी न होने पर भी कई घरों में वॉशिंग मशीनें आ गईं। एक डेरी खुल गई। आमदनी कुछ ही घरों की बढ़ी, मगर जरूरत हर घर में कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। अब लोगों ने मेहमानों को आने पर दूध, मट्ठा देना बंद कर दिया, क्योंकि जरूरतों की आपूर्ति में वे पूरा दूध डेरी पर पहुँचाने लगे थे। अब मेहमान आता तो कोल्ड-ड्रिंक मँगा देते या चाय के साथ पैकिटों में आने वाला नमकीन रख देते।
कई खेत-मजदूरों के परिवार गाँव छोड़कर शहर चले गए क्योंकि जब शहरी की तरह रहना है, तो शहर में रहना ही ठीक रहेगा। वहाँ काम भी पूरे साल रहता है। गाँव में रहकर क्या करेंगे, जब मट्ठा भी किसी घर में न मिले।
चुनाव के समय उस क्षेत्र के एम एल ए ने गाँव को आदर्श गाँव करार देते हुए कहा,“यह हमारी सरकार की उदार-नीति की वजह से ही संभव हुआ। अब हमारे ग्रामीण भाइयों को काम के लिए भागना नहीं पड़ता, बैंक उनके द्वार पर पहुँचकर कर्ज देने आता है। इस बार भी अगर हमारी पार्टी को आपने सरकार बनाने का मौका दिया तो आसपास का हर गाँव आदर्श गाँव बन जाएगा।”
इंसाफ
गाँव में पानी की कमी नहीं थी। लोग खुशहाल थे। बड़े टोले में ब्राह्मण, बनिये और ठाकुर रहते थे। छोटे टोले में दूसरी जातियों के लोग रहते थे। गाँव का मुखिया सूरज प्रताप सिंह न्यायप्रिय व्यक्ति था। पंचायत दूध का दूध और पानी का पानी कर देती थी। सूरज प्रताप सिंह का लड़का चन्द्र प्रताप सिंह उनकी कमजोरी था। इकलौते बेटे से बेहद प्यार करते थे।
एक दिन चन्द्र प्रताप सिंह छोटे टोले में वारदात कर आया। रोती-कलपती नारायणी ने घर जाकर माँ से शिकायत की। माँ ने बेटे मल्लू को बताया और लाठी उठाते मल्लू ने सल्लू, अपने पिता को। मल्लू लाठी से सजा देना चाहता था और सल्लू चाहता था कि दण्ड पंचायत दे।
सल्लू की शिकायत पर पंचायत बैठी। सरपंच के पूछने पर चन्द्र प्रताप सिंह ने अपना अपना कुबूल कर लिया। पिता होते हुए भी सरपंच ने सजा सुना दी—गाँव के लोगों के सामने पचास कोड़े! लोग वाह-वाह करने लगे।
तभी नारायणी सामने आ खड़ी हुई—“मेरा क्या होगा?”
सल्लू रो पड़ा—“कौन ब्याहेगा अपना बेटा मेरी बेटी से?”
सरपंच ने कहा—बहुत-से लोग गरीब हैं तुम्हारी जात में। मैं विवाह करने वाले को बड़ी रकम दूँगा। दौड़-दौड़ कर ब्याह करने वाले आयेंगे।”
“नहीं, मेरा विवाह अपने बेटे से कर दो। उसी ने मेरे साथ कुकर्म किया है। उसी को निभानी होगी मेरे साथ जिन्दगी!”
सरपंच और पंच अवाक-से देखते रहे, मगर बड़े टोले वालों ने लाठियाँ उठा लीं। छोटी जात की लड़की से विवाह! असम्भव।
छोटे टोले वालों ने भी लाठियाँ उठा लीं—जो काम आदमी औरत के साथ विवाह के बाद करता है, वह काम नारायणी के साथ विवाह से पहले क्यों किया चन्द्र प्रताप सिंह ने?
इस गलती का मुआवजा दे रहे हैं सरपंच!
बड़े टोले और छोटे टोले में बहस चलती रही। नारायणी समझ गई कि चाहे लाठियाँ चल जाएँ, लोग कट मरें, मगर जाति को लेकर कभी भी इंसाफ सच्चाई के करीब नहीं पहुँच सकता है। वह वहाँ से हट गई।
बहस के बीच पास ही के कुएँ से ‘छपाक्’ का शोर उठा। काफी कोशिश के बाद कुएँ से जो लाश निकली, वह नारायणी की थी।
स्वाद
दो देशों में युद्ध छिड़ा हुआ था। एक पहाड़ी पर अचानक उन देशों के सिपाही आमने-सामने हो गए। दोनों, दुश्मन सिपाही से बचने के लिए पेड़ की ओट में आकर बंदूकें दागने, मगर कुछ हुआ नहीं। तभी एक पेड़ के पीछे से आवाज आई—“गोलियों से बच गया, पर अब तू बचेगा नहीं। तुझे मारकर देश का एक दुश्मन तो खत्म होगा ही।”
दूसरे पेड़ के पीछे से भी वैसे ही कटु शब्द उभरे—“तुझे मारकर मुझे पुण्य ही नहीं, पुरस्कार भी मिलेगा कमीने।”
और दोनों तरफ से हैंड-ग्रेनेड उछाल दिए गए। दोनों ही के शरीर फट गए। पेड़ों पर बैठे दो गिद्ध किचकिचाकर किलक उठे—“मजा आ गया! दोनों दुश्मन थे तो उनके मांस का स्वाद भी अलग-अलग होगा।”
गिद्धों ने एक-एक लाश का मांस नोंचकर खाया। फिर लाशें बदलकर खाईं। एक ने दूसरे से पूछा—“तुझे फर्क लगा?”
“नहीं तो।”
“मुझे भी नहीं लगा!”
ऐसा होता ही है
पत्रकार ने एक बूढ़े रईस अरब द्वारा नाबालिग हिन्दुस्तानी लड़की से विवाह का भंडाफोड़ कर दिया। लड़की नारी-निकेतन भेज दी गई, मगर पुलिस बूढ़े अरब को नहीं पकड़ सकी। वह अपनी एम्बेसी पहुँच गया और एम्बेसी ने उसे देश भेज दिया।
पत्रकार को सम्मानित करना था, इसलिए बड़ी सभा का आयोजन सरकार द्वारा हुआ जिसमें जनता बुलाई गई थी। समारोह चल ही रहा था कि एक आदमी ने खबर दी—पास की बिल्डिंग के चार नौजवानों ने एक दस वर्षीय लड़की से बलात्कार कर उसे मारकर सड़क पर फेंक दिया।
पुलिस आ गई। लड़की पूरी तरह मरी नहीं थी। अंतिम साँसें लेते हुए उसने चारों के नाम बता दिये।
खबर पत्रकार ने भी सुनी। किसी ने पूछा—“आप लिखेंगे?”
“क्या फायदा। ऐसा तो रोज होता रहता है।”
भूत-1
शहर के विशाल मनकामेश्वर देवालय में रोज ही पट बंद हो जाने के बाद दर्शनार्थी भूतों का ताँता लग जाता। एक दिन भूत भोलासिंह ने रुद्रप्रताप नामक भूत से पूछा—“क्या मनौती माँगते हो भगवान भूतनाथ से?”
एक दीर्घ नि:श्वास खींचकर भूत रुद्रप्रताप ने कहा—“मैं इसी शहर का रहने वाला था। मेरी शादी एक बहुत ही सुंदर लड़की से हुई थी जिसे मैं बेतहाशा प्यार करने लगा था। मगर मुझे नहीं मालूम था कि उसका एक प्रेमी भी है। अपने प्रेमी के साथ षड्यंत्र रचकर उसने मेरी हत्या कर दी। वह अक्सर इस मंदिर में आती है। जिस दिन भी अकेली मिल गई…।”
बीच में ही बोल पड़ा भूत भोलासिंह—“…तो तुम उसकी हत्या कर दोगे?”
नहीं भाई। मैं उससे प्यार करता था और आज भी करता हूँ।”
“फिर?”
“मैं उससे पूछूँगा कि प्रेमी के प्यार के मुकाबले पति का प्यार क्यों निरर्थक-सा रह जाता है?”
भूत-2
भूत रुदप्रताप ने भी एक दिन भूत भोलासिंह से पूछ लिया—“तुम इस मंदिर में क्यों रोज आते हो?”
“क्योंकि मेरी प्रेमिका भी यहाँ रोज आती है और हम दूसरों से निगाह बचाके चुपचाप मिल लेते हैं।”
“चुपचाप क्यों?”
“असल में, पिछले जन्म में मैं दलित था और मेरी प्रेमिका सवर्ण। सवर्ण हमारा प्यार सह नहीं सके और एक गुण्डे को पैसे देकर उन्होंने मुझे मरवा दिया। मेरी प्रेमिका ने दु:खी होकर जहर खा लिया।”
“फिर तो भूत-भूतनी बनकर दोनों साथ रह सकते हो?”
“नहीं भाई! भूतों में क्या कम जातिवाद है!”
“भगवान भूतनाथ से क्यों नहीं कहते हो?”
“जातिवाद को मिटाना तो उनके वश की बात नहीं है। इसीलिए मैं रोज प्रार्थना करता हूँ कि अपनी तरह हम दोनों को भी अर्द्धनारीश्वर बना दें; ताकि हम भी अभिन्न होकर जी सकें।”
अन्तर
गाँधी और मार्क्स एक दिन घूमते हुए अपने-अपने उपग्रहों से बाहर निकलकर तीसरे उपग्रह में पहुँचकर मिल बैठे। मार्क्स ने नि:श्वास खींचकर कहा—“मैं वर्गहीन समाज की कल्पना करता रहा। सोचता था कि लुटेरे पूँजीपतियों की पूँजी एक दिन सर्वहारा वर्ग के हाथों में होगी। मगर देख रहा हूँ कि सोवियत संघ टूट गया, आधा चीन बाजारवाद के दंगल में व्यस्त है और हिन्दुस्तान में बंगाल जैसे साम्यवादी प्रांत में, वहाँ का मुख्यमंत्री विदेशी पूँजी-निवेश के लिए हाँक लगा रहा है।”
गाँधी ने भी नि:श्वास खींची—मैं रामराज्य चाहता था। गाँवों को सम्पन्न बनाना चाहता था, उद्योगपतियों का हृदय परिवर्तन करना चाहता था और धर्म को सहिष्णुता का प्रतीक बनते देखना चाहता था…मगर…।”
“हाँ, न सत्य रहा और न अहिंसा!” मार्क्स ने कहा।
“हाँ, वर्ग-संघर्ष भी नहीं रहा। जम गया वर्ण-सघर्ष। हम दोनों नाबाद हो गये।” गाधी बोले।
मार्क्स ने यथार्थ महसूस किया और कहा—“मेरी चाहनाओं और तुम्हारी चाहनाओं में अन्तर नहीं था। मगर मेरे और तुम्हारे अनुयायी एक-दूसरे को मिटाने में जुटे रहे। परिणाम----एक नृशंस अमरीका का जन्म!”
विजय जी का संक्षिप्त परिचय:
कथाकार विजय, सेवानिवृत वैज्ञानिक(रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) हैं। इनकाजन्म 06 सितम्बर, 1936 को आगरा(उत्तर प्रदेश) में हुआ। एक किशोर उपन्यास समेत इनके अब तक 6 उपन्यास, 15 कहानी-संग्रह, 2 बाल-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनकी अनेक कहानियों का अँग्रेजी, उर्दू, उड़िया, तेलुगु आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। कथाकार जोगिंदरपाल के उपन्यास ‘पार परे’ समेत उनकी अनेक कहानियों और लघुकथाओं का उर्दू से हिन्दी में अनुवाद कर चुके हैं। अनेक पुस्तकों की समीक्षाएँ प्रकाशित।
संपर्क:115 बी, पॉकेट जे एंड के, दिलशाद गार्डन, दिल्ली—110095(भारत)
सन 1966 में सुगनचंद्र ‘मुक्तेश’ का लघुकथा-संग्रह ‘स्वाति बूँद’ प्रकाशित हुआ। इसकी अधिकांश रचनाएँ उपदेशात्मक हैं। सन 1979 में दुर्गेश की पचास लघुकथाओं का संग्रह ‘कालपात्र’ प्रकाशित हुआ, जिसका मुख्य-स्वर व्यंग्य है। वर्ष 1963 में प्रकाशित ‘अनमोल सीपियाँ’ नाम से कृष्णा भटनागर का संग्रह प्रकाशित हुआ जिसकी अधिकांश लघुकथाएँ उपदेशात्मक हैं। 1984 में पुष्पलता कश्यप की 62 चुनिंदा लघुकथाओं का संग्रह ‘अहसासों के बीच’ प्रकाश में आया। इनकी लघुकथाएँ इस विधा को सही दिशा देने में सक्षम हैं। 1985 में योगेन्द्र दवे की लघुकथाओं का संग्रह ‘विषमता’ आया तथा इसी वर्ष मुकेश जे रावल का संग्रह ‘मुट्ठी भर आक्रोश’ भी प्रकाश में आया। अंजना अनिल का लघुकथा-संग्रह ‘साक्षात्कार’ 1986 में प्रकाशित हुआ। इसके उपरांत डॉ राम कुमार घोटड़ का पहला लघुकथा-संग्रह ‘तिनके-तिनके’ सन 1989 में व दूसरा लघुकथा-संग्रह ‘क्रमश:’ वर्ष 2000 में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1993 में महेन्द्र सिंह महलान की लघुकथाओं का संग्रह ‘सिलसिला’ प्रकाशित हुआ जिसमें 69 लघुकथाएँ हैं। आम-आदमी से जुड़ी ये लघुकथाएँ विसंगतियों पर प्रहार करती हैं। वर्ष 1996 में तीन महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह प्रकाश में आए। ये हैं— गोविंद गौड़ का ‘प्रहार’, रत्नकुमार साँभरिया का ‘बाँग और अन्य लघुकथाएँ’ तथा भगीरथ का ‘पेट सबके हैं’। 1998 में माधव नागदा का लघुकथा-संग्रह ‘आग’ प्रकाशित हुआ।
इस तरह राजस्थान के लघुकथाकार लघुकथा-साहित्य को निरन्तर समृद्ध करते आ रहे हैं।
संपादित लघुकथा-संकलन
सन 1974 में भगीरथ व रमेश जैन के संयुक्त संपादन में ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ लघुकथा-संकलन प्रकाश में आया। इसमें 31 कथाकारों की 42 लघुकथाएँ तथा भूमिका ‘लघुकथा:गुफाओं से मैदान की ओर’ के अलावा लघुकथापरक 5 टिप्पणियाँ भी संकलित हैं। इस संकलन ने लघुकथा को अँधेरे दायरों से निकालकर जन-साधारण के संघर्ष, त्रासदी, भीषण यथार्थ को भोगने की यातनापूर्ण विडम्बना आदि के बहुआयामी धरातल से जोड़ा है। इसमें कैलाश जायसवाल की ‘पुल बोलते हैं’ एक अनूठी लघुकथा है। ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ को देश में समकालीन हिन्दी लघुकथा-आन्दोलन का पहला संकलन होने का गौरव प्राप्त है।
वर्ष 1983 में आदर्श भारतीय साहित्यकार परिषद, जयपुर द्वारा आयोजित अखिल भरतीय लघुकथा प्रतियोगिता की पुरस्कृत लघुकथाओं का संकलन ‘प्रेरणा’(संपादक: नंदकिशोर ‘नंद’) प्रकाशित हुआ। इसमें श्रीराम ठाकुर ‘दादा’ की लघुकथा ‘सुरसा की विजय’, कमलेश भारतीय की लघुकथा ‘पूछताछ’, रामनिवास ‘मानव’ की ‘एक ही रास्ता’, महेन्द्र सिंह महलान की ‘कटखना भय’, विक्रम सोनी की ‘बनैले सुअर’ तथा मधुकांत की ‘इंटरव्यू’ श्रेष्ठ रचनाएँ हैं।
सन 1984 में महेन्द्र सिंह महलान और मोहन योगी के संपादन में युवा रचनाकार सोसाइटी, फेफाना द्वारा वर्ष 1981, 1982 व 1983 में आयोजित अखिलभारतीय लघुकथा प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत 31 लघुकथाओं के साथ अन्य श्रेष्ठ रचनाओं को शामिल कर कुल 94 लघुकथाओं का संकलन ‘सबूत-दर-सबूत’ प्रकाशित हुआ। मानवीय मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में इस संग्रह को एक सार्थक प्रयास माना गया। इसमें जेबकतरा, अंधी दौड़, सब राजी-खुशी, प्रश्नहीन, ईद मुबारक, पहचान, भूख, धर्मयुद्ध, पागल, सच्ची गवाही आदि प्रथम श्रेणी की लघुअकथाओं के साथ डॉ पांडुरंग भोपले, पारस दासोत, सतीशराज पुष्करणा, सत्यवीर मानव, मदन मोहन ‘उपेन्द्र’, निहाल हाश्मी, शराफत अली खान, बलराम अग्रवाल, विक्रम सोनी, विष्णु प्रभाकर तथा महेन्द्र सिंह महलान की रचनाएँ विशेषत: सराही गईं।
1985 में महेश संतुष्ट, ओम पुरोहित ‘कागद’, राजेश चड्ढा, नरेश विद्यार्थी के संपादन में मरुधरा साहित्य परिषद, हनुमानगढ़ संगम का काव्य व लघुकथा-संकलन ‘मरुधरा’ छपा। इसी वर्ष वकील साहेब(स्नेह इन्द्र गोयल), प्रमोद कुमार शर्मा, संदीप डूमरा ‘गंभीर’, गुरमीत सोहल के संपादन में युवा लेखक संघ, हनुमानगढ़ का काव्य एवं लघुकथा-संकलन ‘साहित्य प्रसव’ प्रकाशित हुआ। नन्दकिशोर ‘नन्द’ पारीक द्वारा संपादित ‘अंजलिभर धूप’ में भी कविताएँ और लघुकथाएँ संकलित हैं।
वर्ष 1986 में माधव नागदा के संपादन में ‘पहचान’ लघुकथा-संकलन संबोधन प्रकाशन, कांकरोली से प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित लघुकथाएँ अपने कथ्य एवं शिल्प के ताजेपन के कारण अपनी सशक्त पहचान बनाती हैं। ये लघुकथाएँ मनुष्य के सुखद भविष्य के प्रति तो आश्वस्त करती ही हैं, उन षड्यंत्रों को भी बेनकाब करती हैं जो लगातार आदमी के खिलाफ किए जा रहे हैं। डॉ वेद प्रकाश अमिताभ, कमल चोपड़ा, बलराम अग्रवाल, यश खन्ना ‘नीर’ और पारस दासोत के महतवपूर्ण लेख इस संग्रह में उपलब्ध हैं।
वर्ष 1987 में पूरे देश में कुल ग्यारह लघुकथा-संकलन प्रकाशित हुए। विद्वान समीक्षकों की राय में इनमें महेन्द्र सिंह महलान व अंजना अनिल द्वारा संपादित ‘संघर्ष’ के अतिरिक्त कोई अन्य संकलन ऐसा नहीं है, जिसे उल्लेखनीय कहा जा सके। इस दृष्टिकोण से 1987 का वर्ष पूर्णत: राजस्थान के खाते में दर्ज होता है। इस संग्रह की लघुकथाओं में तकनीक को लेकर सजगता का भान स्पष्ट दिखाई देता है। राजकुमार सिंह की ‘कुत्ता पाठ-एक’ में फैंटेसी का उपयोग हुआ है तो डॉ शंकर पुणतांबेकर की ‘अवैध संतान’ में प्रतीकात्मकता मुखर है। सुशील राजेश की ‘अलगाव’ में अभिप्राय को सिर्फ संवादों के माध्यम से कहा गया है। सुकेश साहनी की ‘वापसी’ में पूर्वदीप्ति का इस्तेमाल सार्थक ढंग से हुआ है। आनन्द बिल्थरे की ‘इनसे कहना’ में मिथक को आधुनिक रूप दिया गया है। अशोक मिश्र की ‘आँखें’ में व्यंग्य का प्रभाव रेज़र की छुअन जैसा है। इस प्रकार इस संग्रह की लघुकथाओं में शिल्पगत सुन्दरता एवं वैविध्य पर्याप्त मात्रा में है और ये रचनाएँ पाठकों को वैचारिक खुराक देकर बहुत-से मुद्दों पर सोचने-विचारने की प्रेरणा देने के लिहाज-सेबहुत महत्वपूर्ण हैं।
पुस्तक में लघुकथा के सफल एवं चर्चित हस्ताक्षर कमल चोपड़ा से अंजना अनिल द्वारा लिया गया साक्षात्कार है जिसमें लघुकथा पर उठ रहे विभिन्न प्रकार के प्रश्नों के समुचित उत्तर दिए गए हैं। महेन्द्र सिंह महलान ने अपने लेख ‘लघुकथा प्रतियोगिताएँ : दशा एवं दिशा’ में प्रतियोगिताओं के आयोजन के कारणों पर प्रकाश डालते हुए इस कार्य की विस्तृत समीक्षा की है। भविष्य में प्रतियोगिता आयोजित करने वाले महानुभावों के लिए यह लेख एक मार्गदर्शक का कार्य कर सकता है। मुद्रण, साज-सज्जा व कागज के दृष्टिकोण से यह पुस्तक अत्यंत सुन्दर है। जालंधर दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम में इसे स्क्रीन पर दिखाया गया। ‘हालात’ व ‘हस्ताक्षर’ की भाँति यह पुस्तक व्यापक स्तर पर अत्यन्त चर्चित हुई।
मोहन सोनी ‘अनन्त सागर’ के सम्पादन एवं प्रकाश पंकज के संयोजन में गुलजस्ता रचना मंच, लोढ़सर द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में पुरस्कृत तथा अन्य विशिष्ट लघुकथाओं को लेकर वर्ष 1988 में ‘यथार्थ’ नामक संकलन आकर्षक साज-सज्जा के साथ छपा। संपादकीय, संयोजकीय एवं निर्णायकीय(विक्रम सोनी व लतीफ घोंघी) की औपचारिकता के बाद प्रतियोगी लघुकथाएँ साभार ली गई हैं। तरुण जैन, डॉ सतीशराज पुष्करणा, डॉ उषा माहेश्वरी, माधव नागदा, सतीश राठी, कर्मेन्द मणि ‘भारतीय’ तथा धीरेन्द्र शर्मा के लेख हैं जो अपने-अपने स्थान पर उपयोगी हैं। यह पुस्तक युवा संपादकों के परिश्रम की एक सफल कोशिश है।
वर्ष 1989 में व 1990 में मार्च तक देश में कुल 18 संपादित लघुकथा-संकलन प्रकाशित हुए। समीक्षकों की राय में इनमें मात्र 5 ऐसे संकलन थे जो लघुकथा की यात्रा को विकास देते हैं। इनमें महेन्द्र सिंह महलान व अंजना अनिल द्वारा संपादित वर्ष 1989 में प्रकाशित लघुकथा-संकलन ‘मंथन’ का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मुद्रण, साज-सज्जा व कागज के दृष्टिकोण से यह पुस्तक ‘संघर्ष’ की तरह अत्यंत सुन्दर बन पड़ी है। इसमें एकल लघुकथा-संग्रहों पर देश में पहली बार एक अद्भुत कार्य हुआ है। संग्रह में डॉ सतीशराज पुष्करणा, मधुकांत, कमलेश भारतीय, डॉ किशोर काबरा, पूरन मुद्गल, डॉ सुरेन्द्र मंथन, पुष्कर द्विवेदी, मुकेश जैन ‘पारस’, अमरनाथ चौधरी ‘अब्ज’, चन्द्रभूषण सिंह ‘चन्द्र’, डॉ राजेन्द्र भारती, बृजेन्द्र सिंह ‘वैरागी’, अतुल मोहन प्रसाद, पारस दासोत, सिन्हा वीरेन्द्र, डॉ राम निवास मानव, अंजना अनिल, लखन स्वर्णिक, कृष्णा भटनागर, डॉ सतीश दुबे के निजी लघुकथा-संग्रहों की विस्तृत समिक्षाएँ की गई हैं तथा इनकी दो से छह तक चुनिंदा लघुकथाओं को लेकर 89 लघुकथाएँ संकलन में संजोई गई हैं। इसमें महेन्द्र सिंह महलान का एक लेख ‘एकल लघुकथा संग्रह:स्थिति और मूल्यांकन’ है जो पुस्तक को अतिरिक्त गरिमा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त अंजना अनिल द्वारा डॉ सतीश दुबे से लिया गया साक्षात्कार है जो लघुकथा को एक दिशा प्रदान करता है। वर्ष 1989 में ही डॉ स्नेह इन्द्र गोयल द्वारा संपादित संकलन ‘दर्पण’ श्रीगंगानगर से प्रकाशित हुआ।
राजस्थान शिक्षा विभाग सन 1967 से लगातार महत्वपूर्ण संकलन देश के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों के संपादन में प्रकाशित कराता आ रहा है। इन संकलनों में साहित्य की अन्य विधाओं के साथ लघुकथाओं को पर्याप्त सम्मान के साथ स्थान दिया जाता रहा है। इसमें राजस्थानी भाषा के संग्रह भी सम्मिलित हैं। शिक्षा विभाग, राजस्थान, बीकानेर का यह देश में पहला और अनूठा प्रयोग है। शिक्षक दिवस, माह सितम्बर में प्रकाशित इन संग्रहों में कुछेक के नाम इस प्रकार हैं—प्रयास(सं शिवानी) वर्ष 1980, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे(सं मृणाल पाण्डे) वर्ष 1982, कूँपल(सं कल्याण सिंह शेखावत) वर्ष 1982, हिबरैड़ो उजास(सं श्रीलाल नथमल जोशी) वर्ष 1983, रास्ते अपने-अपने(सं राजेन्द्र अवस्थी) वर्ष 1985, प्रतिभा के पंख(सं क्षेमचन्द्र ‘सुमन’, पद्मश्री) वर्ष 1992, सुनो कहानी(सं स्वयं प्रकाश) वर्ष 1993, महकते अक्षरों का आकाश(सं डॉ मदन केवलिया) वर्ष 1995 इत्यादि।
वर्ष 1994 में बलराम के संपादन में ‘थार की धार’ लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुआ। इसमें सिंध, गुजरात और राजस्थान की लघुकथाएँ दी गई हैं। संपादकीय में बलराम ने राजस्थान के लघुकथा परिदृश्य पर संक्षिप्त किन्तु सटीक प्रकाश डाला है। इस संग्रह में विजयदान देथा, यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’, सांवर दइया, हरदर्शन सहगल, मोहरसिंह यादव, योगेन्द्र दवे, हसन जमाल, भगीरथ, अंजना अनिल, उषा महेश्वरी, मालचंद तिवाड़ी, शकुंतला किरण तथा विभा रश्मि की कई चुनिंदा लघुकथाएँ इसमे संकलित हैं। ‘विश्व लघुकथा कोश’ के अंतर्गत बलराम द्वारा किए कार्यों में यह पुस्तक काफी महत्वपूर्ण है।(समाप्त)
कमरे में दो चारपाइयाँ बिछी हैं। बीच में एक दहकती हुई अँगीठी कमरे को गर्म कर रही है। एक चारपाई पर बूढ़ा और दूसरी पर बुढ़िया रजाई ओढ़कर बैठे हुए हैं। वे यदा-कदा हाथ अँगीठी की तरफ बढ़ा देते हैं। दोनों मौन बैठे हैं, जैसे राम का जाप कर रहे हों।
“ठण्ड ज्यादा ही पड़ रही है।” बूढ़ी बोली,“चाय बना दूँ?”
“नहीं।” बूढ़ा अपना टोपा खींचते हुए बोला,“ऐसी कोई खास सर्दी तो नहीं।”
बूढ़ी खाँसने लगी। खाँसते-खाँसते बोली,“दवा ले ली?”
बूढ़े ने प्रतिप्रश्न किया,“तुमने ले ली?”
“मेरा क्या है! ले लूँगी।” वह फिर खाँसने लगी।
“ले लो, फिर याद नहीं रहेगा।” बूढ़ा फिर कुछ याद करते हुए बोला,“हाँ, आज बड़के की चिट्ठी आई थी।”
बूढ़ी ने कोई जिज्ञासा नहीं दिखाई तो बूढ़ा स्वत: ही बोला,“कुशल है। कोई जरूरत हो तो लिखने को कहा है।”
“जरूरत तो आँखों की रोशनी की है।” बूढ़ी ने व्यंग्य किया,“अब तो रोटी-सब्जी के पकने का भी पता नहीं लगता।”
“सो तो है।” बूढ़ा सिर हिलाते हुए बोला,“लेकिन वह रोशनी कहाँ से लाएगा!”
कमरे में फिर मौन छा गया। वह उठी, अलमारी से दवा की शीशी निकाली और बोली, “लो, दवा पी लो।”
बूढ़ा दवाई पीते हुए बोला,“तुम मेरा कितना खयाल रखती हो!”
“मुझे दहशत लगती है तुम्हारे बिना।”
“तुम पहले मरना चाहती हो? मैं निपट अकेला कैसे काटूँगा?”
“बड़का है, छुटका है। फिर मरना-जीना अपने हाथ में है क्या?”
बूढ़े ने आले में पड़ी घड़ी की तरफ देखा,“ग्यारह बज गए।”
“फिर भी मरी नींद नहीं आती।” बूढ़ी बोली।
“बुढ़ापा है। समय का सूनापन काटता है।” बूढ़ा लेटते हुए, खिड़की की तरफ देखकर बोला,“देखो, चाँद खिड़की से झाँक रहा है।”
“तो इसमें नई बात क्या है?” बूढ़ी ने रूखे-स्वर में टिप्पणी की।
“अच्छा, तुम ही कोई नई बात करो।” बूढ़ा खीझकर बोला।
“अब तो मेरी मौत ही नई घटना होगी।”
कमरे में फिर घुटनभरा मौन छा गया।
“क्यों, मेरी मौत क्या पुरानी घटना होगी?” बूढ़े ने व्यंग्य और परिहास के मिले-जुले स्वर में प्रतिवाद किया।
“तुम चुपचाप सोते रहो।” बूढ़ी तेज स्वर में बोली,“रात में अंट-संट मत बोला करो!”
विकलांग
माधव नागदा
लँगड़ा भिखारी बैसाखी के सहारे चलता हुआ भीख माँग रहा था—“तेरी बेटी सुख में पड़ेगी। अहमदाबाद का माल खाएगी। मुम्हई की हुण्डी चुकेगी। दे दे सेठ, लँगड़े को रुपए-दो रुपए…!”
उसने एक साइकिल की दुकान के सामने गुहार लगाई। सेठ कुर्सी पर बैठा-बैठा रजिस्टर में किसी का नाम लिख रहा था। उसने सिर उठाकर भिखारी की तरफ देखा। कहा,“अरे, तू तो अभी जवान और हट्टा-कट्टा है। भीख माँगते शर्म नहीं आती? कमाई किया कर।”
भिखारी ने अपने को अपमानित महसूस किया। स्वर में तल्खी भरकर बोला,“सेठ, तू भाग्यशाली है। पूरब जनम में तूने अच्छे करम किए हैं। खोटे करम तो मेरे हैं। भगवान ने जनमते ही एक टाँग न छीन ली होती तो मैं आज तेरी तरह कुर्सी पर बैठा राज करता।”
सेठ ने इस मुँहफट भिखारी को ज्यादा मुँह लगाना ठीक नहीं समझा। वह गुल्लक में भीख लायक परचूनी ढूँढ़ने लगा। भिखारी आगे बढ़ा।
“ये ले, लेजा।”
भिखारी हाथ फैलाकर नजदीक गया। परन्तु एकाएक हाथ वापस खींच लिया, मानो सामने सिक्के की बजाय जलता हुआ अंगारा हो। कुर्सी पर बैठकर ‘राज करने वाले’ की दोनों टाँगें घुटनों तक गायब थीं।
पहरुआ
सत्य शुचि
नानी, सो जाओ ना!
नींद नहीं आ रही है बेटी।
सोने से आ ही जाएगी।
नहीं आएगी।
तुम फिजूल ही रातभर करवटें बदलती रहती हो।
क्या करूँ?
रात को डर लगता है?
नहीं बेटी।
डर भी नहीं लगता है, फिर तुम्हें कौन-सी तकलीफ है?
बहुत बड़ी तकलीफ है।
क्या तकलीफ है?
तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी…। बुदबुदाते-बुदबुदाते अँधेरे कोनों पर ठहरी उसकी आँखें स्वत: ही मुँदती चली गईं।
अमरबेल
मोहन राजेश
“कल पार्टी में मिसेज चावला की साड़ी देखी थी आपने?” एक किलकता स्वर।
“मैं पार्टी में मिसेज चावला की साड़ी देखने नहीं गया था।” मंद, थका-सा प्रतिस्वर।
“हाँ-हाँ, तुम क्यों देखने लगे। देखा अनदेखा कर देना फायदेमंद हो तो लोग जान-बूझकर आँखें बंद कर लेते हैं।” एक तीखा रिमार्क।
“पिछले सप्ताह नहीं, पिछले महीने। वह प्रिंट अब पुराना पड़ गया है, आउट-डेटेड। सच पूछो तो उसे लेकर ही पछताई।”
“वह तो तुम इसे लेकर भी महीने-भर बाद तो पछताओगी ही।”
“मुझे उल्टी-सीधी बातें नहीं सुननी…साड़ी दिलवा रहे हो या…”
“यदि कहूँ—ना, तो?”
“पड़ौस में कहीं जैसे रिकॉर्ड बज रहा हो—मैं मैके चली जाऊँगी, तुम देखते…और अनकहे इस वाक्य की गहराई में डूबते-उतरते उसका सारा प्रतिरोध हवा हो गया।
“खैर, अगले वेतन पर देख लेंगे।” उसने हताश-स्वर में कहा और उसे बाँहों में दबोच लिया।
“अगले पर नहीं, इसी पर।” फिर संशोधन।
“अच्छा बाबा, इसी पर।” वह समर्पित स्वर में बोल गया।
समर्पित क्षणों को भोग लेने के बाद, जब आँखों से नींद दूर जा चुकी थी, वह सोच रहा था—उसके गिर्द, उससे चिपटी एक अमरबेल पड़ी है जो उसे सोखती जा रही है। अमरबेल को लादे रहना वृक्ष की विवशता भी तो हो सकती है—आदिम विवशता।–सोचते हुए उसने आँखें मूँद लीं।
ताज़ा रोटी
हसन जमाल
परंपरागत बर्तन लड़के को बिल्कुल पसंद न थे। उसके नए मित्र के यहाँ चाँदी के बर्तन थे, महँगी क्रॉकरी थी। उसने रूठना शुरू कर दिया।
“माँ, मैं चाँदी की थाली में खाऊँगा।”
“जरूर खाना मेरे लाल, आज तो घी में तर रोटियाँ ही खा ले।”
बेटे ने माँ का कहा मान लिया। चाँदी की थाली नहीं आई।
कुछ दिनों बाद वह फिर रूठा,“थाली बड़ी होती है, तू चाँदी की कटोरी ही ला दे माँ।”
“जरूर ला दूँगी। आज तो दूध में चुरी हुई रोटी खा ले।”
चाँदी की कटोरी को भी न आना था। लड़का परेशान हो गया।
“चलो कटोरी न सही, छोटा-मोटा चम्मच तो हो।” उसके माँ-बाप इतने गए-गुजरे क्यों हैं?—वह सोचता।
“जब तक चाँदी का चम्मच न देख लूँ, खाना न खाऊँगा।” उसने जिद ठान ली।
“चम्मच ला दूँगी बेटे। ले, पराँठा देती हूँ।”
चम्मच नहीं आया। फिर कुछ दिनों बाद लड़का किसी और ही चीज के लिए मचलता हुआ नजर आया।
“मुझे नहीं चाहिए यह चोकर की रूखी-सूखी रोटी। मुझे ताजा रोटी बनाकर दे, गेहूँ की।”
इस बार माँ बेटे को बहला न सकी।
मुआवज़ा
यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’
महमूद मियाँ कई दिनों से परेशान था। उसकी बेटी जवान हो गई थी। कम्बख्त सोलह साल की उम्र में ऐसे हाथ-पाँव निकाले थे कि बीस की लगने लगी।
इसके विवाह की उसे चिंता खाए जा रही थी। वह बेचारा बहुत गरीब था। साधारण साइकिल-मिस्त्री। इस धंधे में आदमियों का पेट भरना कठिन था। वह रात-दिन परेशान रहता। दस-बीस हजार रुपए भी हों तो उसकी परेशानी मिट सकती थी।
वह अपनी माँ को अपना दु:ख-दर्द सुनाता रहता था। साठ वर्षीय उसकी माँ भी चिंता की आग में जलती रहती थी। वह कहती थी—बेटा! मैं तेरा दु:ख-दर्द नहीं मिटा सकती। बुढ़िया हो गई हूँ। कुछ भी काम नहीं आ सकती।
अचानक साम्प्रदायिक दंगा भड़क उठा। सारे शहर में आगजनी, लूट और हत्याओं का नंगा नाच शुरू हो गया। सेना आकर सँभालती, इसके पहले ही अच्छा-खासा विनाश हो गया।
महमूद परेशान था। उसकी माँ न जाने कब घर से निकल गई। उसे पता नहीं चला। बाद में पता चला कि उसकी माँ दंगे में मारी गई है। वह दु:खी हो गया। उसे पछतावा तो इस बात का था कि उसकी माँ निकल कैसे गई!
माँ को दफन कर दिया गया। कब्रगाह से लौटते समय किसी ने उसे बताया कि दंगे के दौरान मारे गए लोगों के परिवार वालों को बीस-बीस हजार रुपए मुआवज़ा दिया जाना है।
वह एक पल के लिए माँ की मौत का दु:ख भूल गया। वह सोचने लगा कि उसकी बेटी की शादी अब आराम से हो जाएगी।
समस्या और समाधान
डॉ मदन केवलिया
वे काफी समय से ताश खेल रहे थे। सिटी मजिस्ट्रेट, डॉक्टर, ट्रेजरी ऑफीसर और दवाई-विक्रेता। मजिस्ट्रेट साहब का मुँह लटका हुआ था, क्योंकि वे पाँच हजार रुपए हार चुके थे। प्लास्टिक के रंग-बिरंगे सिक्के उनकी आँखों में अब चुभने लगे थे। वे जीतने का जितना प्रयास करते, उतना ही हारते जाते। परेशानी यह भी थी कि अब पैसे कैसे चुकाए जाएँगे। सभी लोग मजिस्ट्रेट साहब की परेशानी समझ रहे थे।
अचानक डॉक्टर ने कहा,“मजिस्ट्रेट साहब! आप बीमर हैं।”
सभी लोग हैरान-से डॉक्टर की ओर देखने लगे।
डॉक्टर मुस्कराया,“हम सभी दोस्त हैं और यहाँ मनोरंजन के लिए एकत्र हुए हैं, जेब से पैसा खोने के लिए नहीं।”
अभी तक डॉक्टर की बात किसी के भी पल्ले नहीं पड़ी थी।
डॉक्टर ने फिर कहा,“मैं बात स्पष्ट करता हूँ। मजिस्ट्रेट साहब, आप दो-चार दिनों के लिए बीमारी की छुट्टी ले लीजिए। मैं आपका तथाकथित इलाज करूँगा। दवाइयों के फर्जी बिल अपने व्यापारी मित्र बना देंगे और कोषाधिकारी का काम तो आप सभी जानते ही हैं।”
वे सभी खिलखिलाकर हँस पड़े और फिर दुगुने जोश से खेलने लगे।
जनवरी 1971 में मोहन राजेश ने ब्यावर से प्रकाशित ‘पवित्रा’ में चार लघुकथाएँ प्रकाशित करना आरम्भ किया। रावतभाटा(वाया कोटा) से 1972 में भगीरथ व रमेश जैन ने लघुकथा को समर्पित देश की प्रथम पत्रिका ‘अतिरिक्त’ में न केवल प्रकाशित किया बल्कि एक सार्थक दिशा भी दी। लघुकथा को व्यवस्थित रूप देने में इस पत्रिका का बहुत योगदान रहा। ब्यावर से ही मोहन राजेश के संपादकत्व में 1974 में ‘डिक्टेटर’ साप्ताहिक का दीपावली के अवसर पर अच्छा विशेषांक प्रकाशित हुआ। इससे लघुकथा की पहचान और भी स्पष्ट हो गई। इसी पत्रिका का दूसरा विशेषांक 12 अगस्त, 1976 को भँवर शर्मा और सत्य शुचि के संपादकत्व में आया। यह अंक भी उपयोगी सिद्ध हुआ। जयपुर से प्रकाशित ‘अग्रगामी’(संपादक:जुगल किशोर टकसाली) का एक लघुकथा-विशेषांक जून 1977 में कृष्ण कमलेश के अतिथि-संपादन में प्रकाशित हुआ जो बहुत ही चर्चित व उल्लेखनीय रहा। इसमें 29 लघुकथाएँ थीं तथा लघुकथा विषय पर केन्द्रित 3 लेख भी सम्मिलित थे। इस अंक की प्राय: सभी लघुकथाएँ श्रेष्ठता की गिनती में आती हैं।
प्रभाकर आर्य के संपादन में हिंडौन सिटी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘युगदाह’ का भारी-भरकम विशेषांक कृष्ण कमलेश के अतिथि-संपादकत्व में सन 1979 में निकला। इसमें मुलम्मा, बड़ा आदमी, संवेदनशील, हिस्से का दूध, स्थगन, नियति, नसीहत आदि लघुकथाएँ विशेष रूप से अपने तेवर के कारण प्रभावित करती हैं। भगीरथ व पुष्पलता कश्यप के लघुकथा-विषयक लेख इस अंक की विशेष उपलब्धि हैं। ये लघुकथा के विकास और स्वरूप पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। यह देश का प्रथम लघुकथा-विशेषांक है जिसमें लघुकथारों का सचित्र परिचय प्रकाशित किया गया।
ए हुसैन और क़मर मेवाड़ी के संपादन में कांकरोली से प्रकाशित ‘सम्बोधन’ ने 1982 के अपने अंक में प्रतियोगिता में पुरस्कृत लघुकथाएँ प्रकाशित कीं। भारत, प्रत्याक्रमण, खेल जैसी कालजयी लघुकथाएँ इसी अंक की उपलब्धि हैं। वर्ष 1988 में ‘सम्बोधन’ ने लघुकथा-विशेषांक भी प्रकाशित किया जिसमें मनुष्य के चरित्र-पतन, घनीभूत होती कठिनाइयों, मुखौटाग्रस्त तथा अवसरवादी एवं पलायनवादी प्रवृत्तियों को अनावृत्त करने वाली सशक्त लघुकथाएँ, सटीक समीक्षाएँ, स्तरीय बातचीत व आलेख थे।
प्रताप सिंह शेखावत के संपादन में जयपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘कर्म चिन्तन’ का जनवरी 1983 में लघुकथा-प्रतियोगितांक प्रकाशित हुआ। इसमें गिरोह का आदमी(कालीचरण ‘प्रेमी’), आउट(कमल चोपड़ा), पेट पर लात(विक्रम सोनी), आटा और जिस्म(सतीश राठी), थूक सने चेहरे(महेन्द्र सिंह महलान), कुत्ता-पाठ एक(राजकुमार सिंह) जैसी यादगार रचनाएँ इस अंक की देन हैं। ‘कर्म चिन्तन’ का जनवरी 1985 का अंक लघुकथा-विशेषांक के रूप में निकला। ‘सम्बोधन’ व ‘कर्म चिन्तन’ के ऊपर लिखित अंक बहुत चर्चित एवं प्रशंसित रहे। इनके साथ ही ‘युवा हस्ताक्षर’(हिण्डौन सिटी) तथा ‘लहर’(अजमेर) के लघुकथांक भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे।
वर्ष 1987 में हनुमानगढ़ से महेश संतुष्ट के संपादन में ‘राजस्थान साहित्यिक’ का एक लघुकथा-विशेषांक तथा एक मिला-जुला साहित्यांक छपा। लघुकथांक में राष्ट्रीय व राज्य स्तर के कुछ चोटी के लेखकों की रचनाओं के अलावा श्रीगंगानगर जिले के कई उदीयमान लेखकों की रचनाएँ भी थीं। जिले के लघुकथाकारों को प्रकाश में लाने की दृष्टि से इन दोनों ही अंकों की उपयोगिता विशेष परिलक्षित होती है। वर्ष 1979 में मोहन योगी व महेन्द्र सिंह महलान के संपादकत्व में ‘राजस्थान सावित्री’ के अंकों में रमेश सिंह राणावत व श्रीराम मीणा की व्यंग्य-प्रधान तीखी लघुकथाएँ थीं। श्रीगंगानगर से स्नेह इन्द्र गोयल के संपादन में प्रकाशित होने वाले ‘स्नेहिल संदेश’ में लगातार श्रेष्ठ रचनाएँ देखने में आती रही हैं। श्रीगंगानगर से ही छपने वाले ‘लोक सम्मत’, ‘दैनिक प्रताप’, ‘नियति’ आदि में भी लघुकथा पर उपयोगी सामग्री प्रकाशित होती रही है।
जयपुर से प्रकाशित होने वाली प्रदेश की मुख्य साप्ताहिकी ‘इतवारी पत्रिका’ ने शुरू-शुरू में यद्यपि लघुकथाओं से परहेज किया, लेकिन 1978-79 में पहली बार इस पत्रिका ने पुष्पलता कश्यप की लघुकथाएँ धारावाहिक रूप से 11-11 की संख्या में सचित्र छपीं। ये लघुकथाएँ अत्याधिक चर्चित व प्रशंसित हुईं और इन्होंने राजस्थान प्रदेश के पत्रों में छाई जड़ता को तोड़ने व इस विधा को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण कार्य किया। जयपुर से प्रकाशित ‘दैनिक नवज्योति’ में भी स्तरीय लघुकथाएँ छपती रहीं हैं।
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की पत्रिका ‘मधुमती’ में श्रेष्ठ लघुकथाएँ छपती रही हैं। इस अकादमी और ‘युगधारा’ के संयुक्त तत्वावधान में नवन्बर 1992 में अकादमी के सभागार में एक लघुकथा-संगोष्ठी का आयोजन किया गया था।
इन पत्र-पत्रिकाओं के अलावा अलवर विचार टाइम्स, विवेक विकास, सूर्यमुखी, निरन्तर कालबोध, प्रताप केसरी, तटस्थ, आसंगिनी, परिदृष्टा, लोक शासन, प्रभासिका, बात तो चुभेगी, युवादृष्टि, राजस्थान शिक्षक, शिविरा, लोक संपर्क, श्रमोपदेशक, अपूर्ण, राही, जगमग दीप ज्योति, राजस्थान विकास, विश्वम्भरा, वरदा, गुलजस्ता, परिणय संदेश, वातायन, सीमा संदेश, राजस्थान सुजस तथा शेष इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं ने भी लघुकथा के प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार में सहयोग देकर राजस्थान की साहित्यिक एकजुटता का परिचय दिया है।
राजस्थानी भाषा की पत्र-पत्रिकाएँ
राजस्थानी भाषा में लघुकथा का अंकुरण किशोर कल्पनाकांत द्वारा संपादित ‘ओलमो’ के सन 1954 में प्रकाशित प्रवेशांक में छपी मुरलीधर व्यास की ‘प्रभु से धरम’ तथा ललित कुमार की ‘आवाज’ व ‘भेद’ शीर्षक लघुकथाओं के रूप में दिखाई देता है। यद्यपि इन लघुकथाओं में लघुकथा के सभी आधुनिक गुण मौजूद नहीं हैं, फिर भी इन्हें लघुकथा की श्रेणी में रखने से नकारा नहीं जा सकता। इस अंक में ये रचनाएँ ‘नानकड़ी कांणी’ यानी ‘छोटी कहानी’ स्तंभ के अन्तर्गत प्रकाशित हुई थीं। डॉ रावत सारस्वत द्वारा संपादित ‘मरुवाणी’(अंक 2, 1956) में शान्ति शर्मा की रचना ‘बिचारो दिनकर’ लघुकथा के रूप में दृष्टिगत है। 1956 में ही अद्भुत शास्त्री द्वारा संपादित ‘कुरजा-1 में लघुकथा स्तंभ के अन्तर्गत श्रीलाल नथमल जोशी की रचना ‘गोथळी रा लाड’ छपी। अगस्त 1973 में रमेश बतरा के संपादन में ‘तारिका’ का लघुकथा-विशेषाँक प्रकाशित हुआ। विविध भाषाओं के इस विशेषांक में राजस्थानी भाषा की लघुकथाएँ भी थीं।
‘राजस्थली’ त्रैमासिक के सितम्बर-दिसम्बर 1980 अंक को उसके संपादक श्याम महर्षि ने लघुकथांक के रूप में प्रकाशित किया।इसमें हिन्दी और राजस्थानी भाषा की लघुकथाएँ राजस्थानी में छापी गई थीं। इनमें मुकुट सक्सेना की ‘धर्मालु’, श्रीकांत मंजुल की ‘अक्कलवान’ एवं भगीरथ की ‘बगलो भगत’ उल्लेखनीय रहीं। बीकानेर से प्रकाशित होने वाली राजस्थानी भाषा एवं साहित्य संगम की पत्रिका ‘जागती जोत’ में भी लघुकथाएँ छपती रही हैं। रूपराम ‘आशादीप’ के संपादकत्व में श्रीगंगानगर से प्रकाशित त्रैमासिक ‘गोरबंद’ के 1988-89 के संयुक्तांक में प्रदीप नील, सेवासदन मनोज, मदन अरोड़ा, जया नर्गिस, निरंजन जमींदार, शराफत अली खान तथा महेन्द्र सिंह महलान की हिन्दी लघुकथाओं के राजस्थानी भाषा में सुन्दर अनुवाद देखने को मिलते हैं।
जोधपुर से प्रकाशित मासिक ‘माणक’ राजस्थानी भाषा की व्यापक प्रसार-प्रचार वाली एक उत्कृष्टपत्रिका है। इसमें लघुकथा स्तम्भ के अन्तर्गत प्राय: स्तरीय लघुकथाएँ प्रकाशित होती रही हैं।
विष्णुजी के देहावसान की सूचना पूरी तरह से चौंकाने वाली रही। उनकी गत चार जन्मदिन-पार्टियों में तो लगातार उपस्थित रहने का अवसर मिलता रहा। पिछ्ले महीनों में कई बार सोचा कि जाकर एक दिन उनका दर्शन कर आऊँ। दो-चार दिन पहले ही शकुन्तला किरण से बातचीत के दौरान भी उनको देखकर आने का जिक्र हुआ था, लेकिन… मेरा आलस्य, मेरी संवेदनहीनता, मेरा आलस्य। न इनका कोई अंत है और न इनके द्वारा मिलने वाले हर प्रकार के कष्टों का। कष्टकारक हैं, फिर भी ये छूट नहीं पाते, पता नहीं क्यों? यों पता तो है कि ये छूट क्यों नहीं पाते, फिर भी कहा यही जाता है कि पता नहीं क्यों? बात दरअसल यह है कि आलसी आदमी सृष्टि में सिर्फ और सिर्फ एक ही व्यक्ति को प्यार करता है, और वह आदमी कोई दूसरा नहीं वह खुद ही होता है। प्यार करने के मामले में, वैसे तो, एक ही लाइन में कहूँ तो यह कि हर आदमी सबसे ज्यादा खुद को प्यार करता है, किसी और को नहीं। केवल खुद से प्यार न होता तो विष्णुजी को देखने जा पाना इतना दुष्कर तो नहीं था। खुद से प्यार किया इसीलिए तो दिल्ली में रहते हुए भी उनका अंतिम दर्शन तक न कर पाने का दण्ड मिला। निधन का समाचार भी शिमला से मिला—बड़े भाई बद्री सिंह भाटिया जी के द्वारा। विष्णुजी की चिता को एक लकड़ी उनकी ओर से सौंपने का अनुरोध तक मैं पूरा नहीं कर पाया, यह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है। शिमला में बैठा उनका प्रशंसक दिल्ली में बैठे अपने छोटे भाई से इतनी अपेक्षा तो कर ही सकता है।…सिर्फ अपेक्षा।
चिता को अंतिम समिधा सौंपने का सौभाग्य कविवर त्रिलोचन शास्त्रीजी ने अवश्य प्रदान किया था। यमुना विहार में उनके प्रवास के दौरान उनके मुख से जितनी बातें सुनीं, उन्हें कलमबद्ध करना तुरंत आसान नहीं रहा तो बाद में कैसे रहता। उनके सान्निध्य में कुछ दिनों तक कुछेक घण्टे बिताए, वाग्देवी की यही कृपा क्या कम है?
हालाँकि लगभग एक साल बीत चुका; फिर भी, ज्यादा दिन नहीं हुए ऐसा लगता है।जून 2008 के दूसरे सप्ताह की बात है। श्रीयुत उमेश चन्द्र अग्रवालजी(स्वामी:आलेख प्रकाशन, दिल्ली) से आदरणीय विष्णुजी के जन्मदिन (21 जून) पर उनके निवास पर जाने के बारे में बात हुई तो उन्होंने अपनी रजामंदी दे दी। उसके बाद एक दिन फोन आया कि आदरणीय से रा यात्रीजी भी विष्णुजी के दर्शनार्थ जाने के इच्छुक हैं, लेकिन भीड़-भाड़ से बचने और आराम से बातें करने की दृष्टि से उनकी सलाह है कि 21 के बजाय 20 को चला जाए। मुझे इसमें भला क्या एतराज हो सकता था। होता भी तो यात्रीजी केवल मेरे न जाने की वजह से रुक जाने वाले व्यक्ति नहीं थे। मुझे अच्छा ही लगा कि इस बार यात्रीजी भी साथ होंगे। मैंने हाँ कह दी।
20 जून 2008 को हम तीन व्यक्ति(सर्वश्री से रा यात्री, उमेश चन्द्र अग्रवाल और मैं यानी बलराम अग्रवाल) शाहदरा के मेट्रो रेल स्टेशन पर मिले। वहीं पर मालूम चला कि अजित कुमारजी का निवास कोहाट मेट्रो स्टेशन के नजदीक ही है और उनसे भी भेंट करने आने के बारे में यात्रीजी की बात हो गई है। यात्रीजी ने कहा—“बलराम, ‘कोहाट’ उतरकर पहले अजित कुमार से भेंट करेंगे, फिर विष्णुजी के यहाँ जाएँगे।”
“जी।” मैंने कहा। यात्रीजी जैसे व्यक्तित्व की कृपा से ही भाई स्वयं प्रकाश से उनके भोपाल निवास पर भेंट हुई थी और लघुकथा-कहानी पर बड़ी सार्थक चर्चा हुई थी। अब उन्हीं के कारण अजित कुमारजी से भेंट करने का अवसर मिलने वाला था।
कोहाट उतरकर हम अजित कुमारजी के निवास पर पहुँचे। वह यात्रीजी का इंतजार कर रहे थे। अच्छी गर्मजोशी के साथ उन्होंने हमारा स्वागत किया। अपने पुराने दिनों के बहुत-से ऊँचे-नीचे संस्मरण उन्होंने सुनाए। तार-सप्तक की कवयित्री अपनी बहन सुश्री कीर्ति चौधरी, जिनका उन्हीं दिनों लंदन में देहांत हुआ था, को याद करके आँखें नम कीं। कहा कि पति-पत्नी दोनों की शारीरिक अक्षमता के चलते अब कहीं जाया-आया नहीं जा सकता। व्यस्त और कष्टभरी दिनचर्या के बारे में बताया। बच्चनजी(हरिवंशराय) के साथ बिताए दिनो के संस्मरणों पर केन्द्रित ज्ञानपीठ से आने वाली उस पुस्तक के बारे में बताया जो अब आ चुकी है। दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी नियुक्ति के पीछे की राजनीति का खुलासा किया और एक खास बिन्दु को याद करके अफसोस भी जाहिर किया। गरज यह कि उन्होंने हर बात खुले दिल से की। मैं उनके सामने नया व्यक्ति था, लेकिन कोई संकोच, कोई छिपाव उन्होंने नहीं बरता।
और उस समय, जब यात्रीजी ने यह बताकर कि हमें अब विष्णुजी के घर भी जाना है, वहाँ से उठ खड़े होने का प्रयत्न किया तो अजित कुमारजी ने अनुरोध किया कि हम अगर दस-पन्द्रह मिनट और रुक सकें तो वह भी इस गंगा में डुबकी लगाने के इच्छुक हैं। हृदय की गहराई से उन्होंने कहा कि वह अनेक बार विष्णुजी से भेंट करने के लिए जाने के बारे में सोचते हैं, लेकिन जा नहीं पाते।
“अब, आप लोगों का सान्निध्य मिल रहा है तो मैं भी हो आऊँगा।” वह बोले,“मिसेज लौटकर आती ही होंगी, उसी गाड़ी में हम चले चलेंगे।”
यह अनुरोध किसी भी तरह टाल सकने वाला नहीं था। हम पुन: बैठ गए।
गाड़ी आ गई। हम लोग बैठे और विष्णुजी के निवास की ओर चल दिए।
विष्णुजी का महाराणा एन्क्लेव, पीतमपुरा लगभग वहींरहने वाले अजित कुमारजी और उनके ड्राइवर के लिए भी बहुत आसान नहीं रहा। रास्ते में एक-दो बार पूछताछ करनी ही पड़ी। मैं पिछले वर्ष भी यहाँ आ चुका था, लेकिन इस बार भी विष्णुजी के निवास की ओर ले जाने वाले रास्तों से खुद को उतना ही अनजान पाया जितना कि पिछली या कहूँ कि पहली बार में पाया था। बहरहाल, ड्राइवर काफी समझदार था और एक ही बार की पूछताछ में सारे मोड़ समझ गया। दोबारा किसी से कुछ भी पूछे बिना उसने हमें विष्णुजी के निवास के बाहर उतार दिया।
हम अन्दर दाखिल हुए। सबसे आगे यात्रीजी और पीछे-पीछे हम सब। अनिता दीदी (विष्णुजी की बड़ी बेटी) वहीं पर थीं। वह बहुत आत्मीय हैं। उनकी मुस्कराहट मुझे विष्णुजी की सौम्यता की याद दिला देती है।
विष्णुजी शैय्या पर लेटे हुए थे, लेकिन जाग रहे थे। हम सब ने लगभग एक साथ ही उनका अभिवादन किया।
“नमस्कार…नमस्कार…” लेटे-लेटे ही हाथों को जोड़कर अभिवादन को स्वीकार करते विष्णुजी ने कहा,“बहुत दिनों बाद कोई साहित्यकार मिलने आया है।”
उनका यह वाक्य सुनते ही मुझे कुछ ही दिनों पहले जनसत्ता में छपा भाई प्रेमपाल शर्मा का वह लेख याद हो आया, जिसमें विष्णुजी की इस मर्मान्तक पीड़ा को स्वर दिया गया था और जिस पर लम्बी चर्चा हुई थी। उस चर्चा में किन्हीं अति-विद्वान महाशय ने यहाँ तक वमन किया था कि साहित्यकार खुद जनता के बीच नहीं जाते हैं अत: जनता के उनके पास न आने का उन्हें अफसोस नहीं होना चाहिए। उन महाशय को यह ख्याल ही नहीं रहा कि चर्चा विष्णुजी के बारे थी। उन विष्णुजी के बारे में, जो थे ही जनता के बीच के लेखक।
इस दौरान यात्रीजी विष्णुजी के समीप बैठकर यात्रीजी ने गहन आत्मीयता के साथ उनका दायाँ हाथ अपने हाथ में थाम लिया था। बिल्कुल इस अन्दाज में जैसेकि विष्णुजी के शारीरिक कष्ट स्वयं उनके हों और जैसेकि उनका वश चले तो विष्णुजी को वे कोई कष्ट न झेलने दें।
उससे कुछ ही दिन पहले अपने निवास के बरामदे में संतुलन बिगड़कर गिर जाने की वजह से विष्णुजी के कूल्हे की हड्डी में फ्रेक्चर आ गया था। इसी कारण उन्हें लेटे रहना पड़ रहा था।
जितनी देर हमने विष्णुजी से दो-चार बातें कीं, उतनी देर में आ0 भाभीजी(विष्णुजी की पुत्र-वधू, अतुल प्रभाकर की पत्नी) हम लोगों के लिए चाय-आदि ले आईं। हमने सबसे पहले नाश्ते की प्लेट्स में रखे स्वीट-पीसेज़ को चम्मच से काटकर एक दिन पहले ही विष्णुजी के जन्मदिन का केक काटने की औपचारिकता पूरी की और विष्णुजी को जन्मदिन की बधाई दी।
“ईश्वर करे कि आप सौ बरस जिएँ।” हममें से अधिकांश ने कहा।
यह बेहद औपचारिक दुआ थी। हिन्दी भवन में मनाये गए उनके जन्मदिन के एक समारोह में बोलते हुए प्रबुद्ध पत्रकार प्रभाष जोशीजी ने मंच से बोलते हुए कामना की थी कि—“मेरी इच्छा है कि विष्णुजी शतक मारें, शतक-वीर कहलाएँ…शतक से भी आगे जीएँ।”
यह सम्भवत: 2006 की बात है। विष्णुजी ने उस वर्ष उम्र के 94 वर्ष पूरे किए थे। इतनी उम्र का व्यक्ति ही बता सकता है कि यहाँ पहुँचने के बाद उम्र का एक-एक रन कितना भयावह होता है। अगर प्रभाषजी की दृष्टि से ही देखा जाए तो एक बात पक्के तौर पर कही जा सकती है। यह कि विष्णुजी को वक्त ने रिटायर्ड-हर्ट करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे क्रीज से हटे नहीं, डटे रहे। उन्होंने पूरा प्रयत्न किया कि वे प्रभाषजी जैसे प्रखर क्रिकेट-दृष्टियुक्त हितैषी की कामना का मान रखें; लेकिन वह रन-आउट हो गए। अपना 97वाँ रन पूरा करने हेतु क्रीज में पहुँचने से मात्र 71 दिन पहले वक्त ने उनकी गिल्लियाँ बिखेर दीं। हमारी ओर से खेलता लगने वाला वक्त एकाएक कब विरोधी टीम का खिलाड़ी बन बैठेगा, कोई नहीं जानता।
यद्यपि 2006 में भी विष्णुजी पूर्णत: स्वस्थ नहीं थे, लेकिन चल-फिर लेते थे। सुनाई कम देने लगा था, लेकिन बोलने में कठिनाई का अनुभव नहीं करते थे। परन्तु 2008 में हमारे मिलने जाने के समय वे बहुत अस्वस्थ थे। हालाँकि उस समय भी उन्होंने कहा था कि बोलने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है, मस्तिष्क ठीक-ठाक काम कर रहा है; लेकिन शरीर के दूसरे-दूसरे अवयव थक गये हैं। शायद इसीलिए उस समय उनके द्वारा आयु का शतक पूरा करने की हमारी कामना मुझे बहुत अव्यवहारिक महसूस हुई। घर का कोई व्यक्ति, विशेषत: वह जिसने 70-80-90 साल पूरे कर लिए हों, जब खाट पकड़ लेता है, तब उसके तीमारदारों को कैसा महसूस होता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी व्यक्ति की उपयोगिता उसके प्रोडक्टिव,उसके रचनाशील रहने तक ही रहती है। सक्रिय रचनाशीलता का ह्रास यानी एक व्यक्ति के रूप में लेखकीय उपयोगिता का, उसके बाजार-मूल्य का ह्रास। गत अनेक वर्षों में हमने परलोक सिधार गए अनेक साहित्यकारों की गति देखी है। पता नहीं कितने विमर्शों में उलझे हम ‘सम्मान’ शब्द के अर्थ भूल ही गए हैं।
‘जनगाथा’ के इस अंक में राजस्थान की लघुकथा-यात्रा पर केन्द्रित सामग्री को रोककर श्रद्धेय विष्णु प्रभाकर को श्रद्धांजलिस्वरूप उनकी कुछ बाल-मन की लघुकथाएँ प्रस्तुत हैं।
--बलराम अग्रवाल
विष्णु प्रभाकर की बाल-मन की लघुकथाएँ
शैशव
घर लौटकर वह देखता है कि उसकी मरणासन्न पत्नी के पलंग के पास उसका तीन वर्षीय पौत्र ध्यानस्थ बैठा कह रहा है,“हे भगवान! मेरी अम्मा को अच्छा कर दो।”
इस दृश्य पर वह चकित था और उसकी पत्नी तरल।
दो क्षण बाद वह दवा देने उठा तो उस बालक ने कहा,“मैं दूँगा दवा अम्मा को।”
पत्नी और-भी गदगद हो आयी। बोली,“अब मैं अच्छी हो जाऊँगी।”
लेकिन प्रभु ने बालक की गुहार अनसुनी कर दी। पत्नी अच्छी नहीं हुई। उसकी शव-यात्रा में बालक ने उसपर चँवर ढुलाया और घण्टा बजाया। कई दोन तक कहता रहा,“चँवर ढुलाकर, घण्टी बजाकर अम्मा को भगवान को दे आए। वह फिर आवेंगी।”
कुछ दिन बाद बालक के पिता बीमार हो गए। बालक मस्ती में शोर मचाता घूम रहा था। उसने कहा,“बेटे, शोर मत मचाओ, तुम्हारे पापा बीमार हैं।”
बालक ने तुरन्त सहज-भाव से पूछा,“वैसे ही बीमार हैं, जैसे अम्मा बीमार थीं? उन्हें भी भगवान के पास ले जावेंगे, घण्टी बजाकर, चँवर ढुलाकर।”
जैसे पृथ्वी डोली हो, वह सहम आया। चाहा कि एक थप्पड़ जड़ दे उसके गाल पर; लेकिन तभी उसकी दृष्टि बालक की आँखों पर जाकर अटक गयी। वहाँ तो शैशव बैठा मुस्करा रहा था, वीतराग-नि:संग।
तो अच्छा
बहुतपुरानी बात है। उसका बच्चा कई बार उससे क्रिकेट खेलने का सामान लाने के लिए कह चुका था। वह बार-बार उसको टाल देता था। एक दिन जब वह काम कर रहा था तो वह बालक उसके पास आया और क्रोध में भरकर बोला,“मैं कई दिन से तुमसे खेलने का सामान लाने के लिए कह रहा हूँ, लेकिन तुम लाते नहीं।”
“उसने सहसा बालक की ओर देखा और कहा,“हाँ, मैं ला नहीं सका।”
“क्यों नहीं ला सके?”
“क्योंकि पैसे नहीं हैं।”
बालक और भी उग्र होकर बोला,“सारा दिन मेज पर बैठे-बैठे लिखते रहते हो, इतने पैसे भी नहीं कमा सकते कि मेरे लिए खेल का सामान ला सको?”
उसने उदासीनता से कहा,“हाँ, नहीं कमा सकता।”
“तो कितना कमा सकते हो?”
“उतना, जितने में अपना और तुम-सबका पेट भरा जा सके।”
यह कहकर उसने बालक की ओर देखा कि वह और-भी उग्र हो उठेगा। लेकिन आश्चर्य, वह उतना ही शान्त हो आया और अपने स्वर में अत्यन्त करुणा भरकर बोला,“तो अच्छा।”
लेकिन बालक जितना शान्त हुआ, उसका पिता सहसा उतना ही अशान्त और उग्र हो उठा। उसका रोम-रोम जैसे उत्तेजित हो उठा हो। उसके जी में आया कि बालक का गला घोंट दे—इस दुष्ट का इतना साहस कि उससे सहानुभूति प्रकट करता है!
यह सब पलक मारते न मारते हो गया। जब उसे होश आया तो वह बालक जा चुका था। लेकिन वह इतना उद्विग्न हो उठा कि उस दिन कुछ काम न कर सका। उसका वह ‘तो अच्छा’ उसके लिए चुनौती बन गया।
शैशव का भोलापन
अपनी मेज पर बैठा लिखने में व्यस्त था। पास के कमरे में बच्चे खेल रहे थे। सहसा सुनता हूँ, मेरे भाई की पाँच वर्षीय बेटी मेरे छह वर्षीय बेटे से कह रही है,“मैं तुमसे शादी करूँगी।”
“कर लेना।” मेरे बेटे ने तुरन्त उत्तर दिया।
मैं कुछ सोच पाऊँ कि आठ वर्षीय बड़ा बेटा तुनककर बोल उठता है,“कर लेना? कैसे कर लेना? तू नहीं कर सकता शादी।”
मेरा छोटा बेटा भी भड़क उठता है,“क्यों नहीं कर सकता? मैं करूँगा।”
बड़ा बेटा सहसा बुजुर्ग हो उठा,“देख, पिताजी ने अम्मा से शादी की है न?”
“हाँ, की है।”
“अम्मा का घर कहाँ है—इलाहाबाद। पिताजी यहाँ दिल्ली में रहते हैं। तभी उनकी शादी हुई। तुम दोनों तो एक ही घर में रहते हो। तुम्हारी शादी कैसे हो सकती है?”
छोटा बेटा जैसे सोच में पड़ गया। दो क्षण सन्नाटा छाया रहा फिर वह मेरी भतीजी से कहता है,“हाँ, यह शादी नहीं हो सकती। मैं नहीं करूँगा तुमसे शादी।”
मैं साँस रोके भतीजी की प्रतिक्रिया की राह देखता हूँ कि जैसे तूफान आ जाता है। मेरी भतीजी चीख उठती है,“कैसे नहीं करेगा शादी, तुझे करनी होगी…।” और यह कहते-कहते अपने हाथ के खिलौने को मेरे छोटे बेटे के सिर पर दे मारती है और तीर की तरह भागती चली जाती है।
अब जो मेरी हँसी छूटती है तो मुझे यह भी पता नहीं रहता कि वे बच्चे भी जोर-जोर से हँस रहे हैं…हँसे जा रहे हैं।
शैशव की ज्यामिती—तीन कोण
माँ समझा-समझाकर परेशान हो गई। उसके चार वर्षीय बेटे टिंकू की शरारतों का अन्त नहीं था। सन्ध्या को पिता लौटे तो उसने बेटे की शरारतों की कहानी सुनाते हुए कहा,“हमारा बेटा बिगड़ता जा रहा है, उसे सँभालिए।”
किसी कारणवश पिता उस समय स्वयं बहुत त्रस्त थे। पत्नी की शिकायत सुनकर वे एकाएक क्रोध से उबल उठे। आव देखा न ताव, तैड़-से एक थप्पड़ टिंकू के गाल पर जड़ दिया,“बदतमीज, दिन पर दिन बिगड़ता जा रहा है।”
टिंकू एकदम जोर से चीख उठा, लेकिन तभी सहसा उसकी दृष्टि पापा के हाथ पर गयी। पाया कि उसमें चोट लगी है और जोर थप्पड़ मारने के कारण उसमें से खून रिसने लगा है। तब रोते-रोते वह एकाएक बोल उठा,“पापा, आप मुझे थप्पड़ न मारें। डण्डे से मारें।”
बच्चे शरारती होते ही हैं, पर अंशु कुछ अधिक ही उत्पाती था। कभी तो उसका उत्पात सीमा लाँघ जाता। उसके ममी-पापा उसे खूब प्यार करते थे, पर जब उसकी शरारतें थमती ही नहीं थीं तो वे उसे पीट भी देते थे।
ऐसे ही अवसर पर एक दिन उसके पापा ने उसके गाल पर जोर-से दो थप्पड़ जड़ दिए। एक बार तो अंशु सहम गया, लेकिन दूसरे ही क्षण गाल पर हाथ रखे-रखे और रोते-रोते उसने कहर-भरी दृष्टि से पापा की ओर देखा और कहा,“प्यार भी करते हो, मारते भी हो। हम नहीं बोलेंगे तुमसे। कुट्टी! कुट्टी!!”
और वह भागा-भागा कमरे से बाहर निकल गया।
मण्टू अपनी दादी का बहुत प्यारा था। इसलिए मरते समय वे विशेष रूप से मण्टू के पिता से कह गयी थी,“बच्चों डाँटना मत। प्यार से रखना।”
मण्टू के पिता स्वयं भी मण्टू को कम प्यार नहीं करते, परन्तु जब मण्टू की शरारतें सीमा लाँघ जाती हैं तो विवश होकर खंग-हस्त हो उठते हैं। ऐसे ही एक दिन जब बहुत समझाने पर भी मण्टू ने शरारत करना बन्द नहीं किया तो उन्होंने खीझकर उसके गाल पर तड़ाक-तड़ाक से दो तमाचे जड़ दिए।
मण्टू तड़प उठा, पर दूसरे ही क्षण उसने आग्नेय नेत्रों से पिता की ओर देखा और चीखकर कहा,“भगवान के पास जाते हुए अम्मा कह गयीं थीं—बच्चों को डाँटना मत, प्यार से रखना; और आप मुझे इतने जोर से मारते हैं। मैं अम्मा के पास चला जाऊँगा।”
और वह चीख-चीख कर रो उठा।
मोहब्बत
गाँव के प्राइमरी स्कूल में वह मेरा सहपाठी था। मेरा सहपाठी था। मेरी उसके साथ विशेष रूप से छनती हो, ऐसा नहीं था। फिर भी, एकाएक वह घटना घट गई। ईद का दिन था। उस गाँव में ऐसा रिवाज था कि उस दिन हिन्दू लोग अपनी गाय-भैंसों का दूध मुसलमानों को बाँट देते थे। बहुत सवेरे काम समाप्त हो जाता था। हमारी गाय-भैंसों का दूध भी उस दिन बँट चुका था। तभी मैंने देखा—मेरा सहपाठी लोटा लिए चला आ रहा है। लोटा खाली था। मैंने पूछा,“तुम्हें दूध नहीं मिला?”
उसने उत्तर दिया,“मुझे आने में देर हो गई। दूध सब बँट गया।”
सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मन में करुणा-सी पैदा हुई। करुणा तो उसे अब कहता हूँ, तब की उस अनुभूति को शब्द नहीं दे सकता। उम्र भी तो हम दोनों की यही नौ-एक साल की रही होगी। उस पर वह बहुत गरीब था। मैंने कहा,“जरा रुको।”
और मैं भागा-भागा अन्दर गया। अपनी माँ से सारी बातें कहीं। कहते-कहते स्वर कुछ भीग आता शायद। माँ ने मेरी ओर देखा। बोली,“दूध तो बेटा सब खत्म हो गया। तुम दोनों भाइयों के लिए बचा रखा है, बस…”
मैंने बिना सोचे तुरन्त कहा,“वही दे दो।”
माँ ने एक बार फिर मेरी ओर देखा। कुछ कहा भी, लेकिन अन्तत: वह दूध सईद को दे दिया। वह खुशी-खुशी चला गया। बात यहीं समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन जैसा कि रिवाज है, मुसलमान मित्र उस दिन सिवैयाँ बनाते हैं और अपने सब रिश्तेदारों और दोस्तों में बाँटते हैं। दोपहर को देखा कि सईद फिर हमारे दरवाजे पर खड़ा है! मैंने पूछा,“क्या बात है सईद?”
उसने भोलेपन-से जवाब दिया,“सिवैयाँ बनाई थीं न, तुम्हारे लिए लाया हूँ।”
मेरे चाचा पास ही खड़े थे। वे मुस्कराए। बोले,“तुम्हारे घर की सिवैयाँ क्या हम खा सकते हैं? किसने दी हैं?”
माँ भी वहीं खड़ी थीं। वह समझ गईं। बोलीं,“बेटे, हम लोग तुम्हारी पकाई हुई सिवैयाँ नहीं खा सकते। तुम बहुत अच्छे हो। इन्हें वापिस ले जाओ।”
सईद कीकुछ भी समझ में नहीं आया। वह कभी मेरी ओर देखता, कभी मेरी माँ की ओर। माँ ने उसे फिर प्यार-से समझाया। अनबूझ-सा वह जाने के लिए मुड़ा, लेकिन न जाने क्या हुआ, कटोरा उसके हाथ से वहीं गिर पड़ा और सिवैयाँ चारों ओर बिखर गईं।
हठात मैंने सईद की ओर देखा। मुझे लगा—वे सिवैयाँ नहीं थीं, इन्सान की मोहब्बत थी जो मेरे दरवाजे पर पैरों से रौंदी जाने के लिए बिखरी पड़ी थी।
पिरीन पियारे पिराणनाथ
वह ग्यारह वर्ष का भी नहीं था, तब की बात है। उत्तर प्रदेश के एक प्रसिद्ध नगर में किसी नातेदार के पास ठहरा हुआ था। सड़क के एक किनारे उनकी बैठक थी। उस पार दुमंजिले पर कोई परिवार रहता था। उस परिवार की केवल स्त्री की याद है। कभी-कभी खिड़की से झाँकते देखता था। एक दिन इशारे से उसने उसे ऊपर बुलाया। आज उसकी जो मूर्ति उसके मस्तिष्क में उभरती है, वह इतनी ही है कि वह स्वस्थ थी। उसके गदराए हुए गालों पर निखार था और आँखों में थी चंचलता। बड़े प्यार-से उसने कहा,“एक चिट्ठी पढ़ दोगे?”
अब तक झिझक रहा था वह, लेकिन अपना गुण प्रकट करने का अवसर पाकर वह तुरन्त बोला,“हाँ-हाँ, मुझे पढ़ना आता है।”
वह मुस्कराई और अन्दर जाकर एक पत्र ले आई। किसी नारी के कच्चे अक्षरों में, लाइनदार कागज पर, दोनों ओर लिखा हुआ एक पत्र था। उस ‘पिरीन पियारे पिराण्नाथ’ से शुरू होनेवाली चिट्ठी को पूरा पढ़ जाने के बाद भी उसकी कुछ समझ में नहीं आया। अनबूझ-सा उस स्त्री की ओर देखता खड़ा रहा। अत्यन्त गम्भीरता-से वह बोली,“तुम्हारे मकान के बायीं ओर वाले घर में जो लड़की रहती है, उसी ने यह पत्र लिखा है।”
उसने बुद्धिमान बनने का गौरव झेलते हुए कहा,“किसको लिखा है?”
वह बोली,“तुम्हारे मकान के दाईं ओर जो मन्दिर है, उसी के पुजारी के लड़के को। लड़की उसे छिपे-छिपे प्यार करती है। दोनों बड़े…”
उसने और क्या-क्या कहा, उस बालक को ठीक याद नहीं है। पर, कहकर वह एकटक इस तरह उसकी ओर देखने लगी थी जैसे कोई गहन रहस्य प्रकट कर रही हो और उस पत्र पर उसकी प्रतिक्रिया जानने को अतिशय उत्सुक हो। पर वह निपट अबोध गूँगा खड़ा ही रहा और वह धीरे-धीरे बोलती रही। फिर एकाएक रुककर बोली,“कुछ खाओगे?”
और वह एक कटोरे में कुछ ले आई। उसे अपने पास खींचकर पुचकारा भी। पर उसने खाया नहीं। लेकिन आज भी, लगभग 60 वर्ष बाद, वह चेहरा उसके मस्तिष्क में उसी तरह अंकित है। भरा हुआ मुख, गदराए कपोल, बड़ी-बड़ी चंचल आँखें और रहस्यमय आत्मीयता से पूर्ण गहन-गम्भीर वाणी। उस मूढ़ और गूँगे बालक को प्रेम का रहस्य समझाती हुई वह नारी या तो अत्यन्त भोली थी या अत्यन्त प्यासी।
वह बच्चा थोड़े ही न था
वह एक लेखक था। उसके कमरे में दिन-रात बिजली जलती थी। तभी प्रकाश मिलता था। एक दिन क्या हुआ कि बिजली रानी रूठ गई। वह परेशान हो उठा। पाँच घण्टे हो गए।
तभी ढाई वर्ष का शिशु उधर आ निकला। मस्तिष्क में एक विचार कौंध गया। बोला,“बेटे, बिजली रानी रूठ गई है, जरा बुलाओ तो उसे।”
शिशु ने सहज-भाव-से पुकारा,“बिजली रानी, देर हो गई, जल्दी आओ।”
और संयोग देखिए, वाक्य पूरा होते न होते वह कमरा बिजली के प्रकाश में नहा उठा।
पापा वायुयान चालक थे। उस दिन वे समय पर घर नहीं लौटे। एक घण्टा, दो घण्टा, पूरे चार घण्टे हो गए। रात हो आई। मम्मी परेशान हो उठी।
तभी छोटी बच्ची भी पापा को पूछती-पूछती वहाँ आ पहुँची। मम्मी बोली,“बेटी, तुम्हारे पापा अभी तक नहीं आए। बहुत देर हो गई। तुम उन्हें पुकारो तो।”
बच्ची ने सहज-भाव-से पुकारा,“पापा, देर हो गई, अब आजाओ।”
तभी दरवाजे की घण्टी बज उठी। पापा खड़े मुसकरा रहे थे।कैसा अदभुत संयोग था यह!
उसकी पत्नी बहुत दूर चली गई थी। वहाँ—जहाँ से डाक भी नहीं आती। एक दिन उसने सोचा—यदि मैं सच्चे मन से पुकारूँ, तो क्या वह लौट नहीं आएगी?
वह सचमुच उसे बहुत प्यार करता था और उसका अभाव उसे बहुत खलता था। इसलिए एक दिन उसने पुकार लिया,“प्रिये, तुम लौट आओ, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पा रहा।”
आठवें दशक के अन्त तक आधुनिक हिन्दी लघुकथा में सामान्य किस्म के संकलनों का दौर रहा है। इन संग्रहों की विषय-वस्तु व्यापक थी। इनमें विविध विषयों की विभिन्न लघुकथाएँ समाविष्ट होती थीं। नौवें दशक में लघुकथा सृजन एवं मूल्यांकन, विवेचन व विश्लेषण के स्तर पर अनेक पड़ावों को पार करती हुई जाँच-पड़ताल के सूक्ष्म, गहन व गंभीर गलियारों में उतर गई। विशिष्ट लघुकथा-संग्रहों के प्रकाशन का प्रारंभ इस दशक की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्ष 1983 में उत्तर प्रदेश से देश का पहला विशिष्ट लघुकथा-संकलन ‘आतंक’(सं नन्दल हितैषी, संयोजन धीरेन्द्र शर्मा) देखने में आया जो पुलिस संबंधी लघुकथाओं पर केन्द्रित था।
राजस्थान से प्रथम विशिष्ट लघुकथा-संकलन वर्ष 1987 में ‘संघर्ष’ नाम से प्रकाशित हुआ जो विशुद्ध रूप से अखिल भारतीय लघुकथा-प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत रचनाओं पर केन्द्रित था। वर्ष 1989 में ‘मंथन’ निकला जिसमें देश में पहली बार एकल-संग्रहों पर कार्य हुआ। इसी क्रम में सन 1998 में ‘राजस्थान का लघुकथा-संसार’ पाठकों के हाथ में आया। यह राजस्थान के लघुकथा-कर्म की प्रथम प्रतिनिधि पुस्तक है।
प्रतियोगिताएँ
देश में लघुकथा-प्रतियोगिताओं का बोलबाला आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में शुरू हो चुका था। लघुकथा-प्रतियोगिता आयोजित करने वाले प्रदेशों में हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा दिल्ली अग्रणी रहे हैं। इनमें भी राजस्थान लघुकथा-प्रतियोगिता का गढ़ ही रहा है। यहाँ प्रतियोगिताओं की शुरूआत वर्ष 1981 से होती है, जब युवा रचनाकार समिति, फेफाना(श्री गंगानगर) तथा आदर्श भारतीय साहित्यकार परिषद, जयपुर ने अखिल भारतीय लघुकथा-प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं। इसके बाद ‘सम्बोधन’(कांकरोली), ‘कर्मचिन्तन’(जयपुर), गुलजस्ता रचना मंच, लोढ़सर(चुरू), साहित्यिक राजस्थान (हनुमानगढ़), युवा मंच(प्रतापगढ़), शेष(लुहारपुरा, जोधपुर), युवा रचनाकार समिति, फेफाना(अलवर) की लघुकथा-प्रतियोगिताएँ प्रमुख हैं। ‘युवा रचनाकार समिति’ ने वर्ष 1981 से 1986 तक लगातार छह सफल प्रतियोगिताएँ आयोजित कर देश में कीर्तिमान स्थापित किया।
राजस्थान से आयोजित इन प्रतियोगिताओं में रचनाओं के मूल्यांकन हेतु डॉ सतीश दुबे, विक्रम सोनी, डॉ मदन केवलिया, डॉ आलमशाह खान, वेदव्यास, श्रीकांत मंजुल, मुकुट सक्सेना, डॉ अमर सिंह, लतीफ घोंघी व क़मर मेवाड़ी जैसे विषय के विद्वान, अनुभव व योग्यता की दृष्टि से निर्विवाद व्यक्तियों को निर्णायक-मण्डल में स्थान देकर लघुकथाकारों की पीठ थपथपा, पुरस्कारों-प्रमाणपत्रों के सम्मान द्वारा उत्कृष्ट लेखन का आदर कर, प्रतिभा पर स्वीकृति की मुहर लगाई गई तथा पुरस्कृत रचनाओं को सम्बोधन, कर्म-चिन्तन, लघु आघात, दर्शन मंथन जैसी पत्रिकाओं के अंकों-विशेषांकों तथा कल हमारा है, प्रेरणा, यथार्थ, सबूत-दर-सबूत, संघर्ष आदि लघुकथा-संकलनों में प्रकाशित कर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्रदान की गई।
शोध-कार्य
भारत में लघुकथा पर जिन्होंने शोध किया, उनमें डॉ शकुन्तला किरण, डॉ शमीम शर्मा, डॉ मंजु पाठक, डॉ अंजलि शर्मा, सुशील राजेश, ईश्वर चन्द्र, आशा पुष्प, नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’, मणिप्रभा, विभा खरे, रामदुलार सिंह ‘पराया’ आदि प्रमुख हैं।
देश में लघुकथा पर सर्वप्रथम शोध-उपाधि प्राप्त करने का श्रेय अजमेर की डॉ शकुन्तला किरण को है। इन्होंने ‘हिन्दी लघुकथा’ विषय लेकर इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर कार्य किया। जनवरी 1996 में डॉ मदन केवलिया(हिन्दी विभागाध्यक्ष, डूँगर कॉलेज, बीकानेर) के निर्देशन में श्रीमती नवनीत को ‘हिन्दी लघुकथा साहित्य का समाज-शास्त्रीय अध्ययन’ विषय पर अजमेर विश्वविद्यालय से पी-एच डी की उपाधि प्रदान की गई।
मंचन
लघुकथाओं के मंचन की शुरूआत देश में सबसे पहले राजस्थान में ही हुई। 1 मई, 1981 को पहली बार रावतभाटा(कोटा) की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘पलाश’ के रंगकर्मियों ने रंगमंच के इतिहास में सर्वप्रथम लघुकथाओं के मंचन का साहसिक एवं सफल प्रयोग किया। मंचित लघुकथाओं में चित्रा मुद्गल की ‘नसीहत’, लक्ष्मीकांत वैष्णव की ‘लोग’, डॉ सतीश दुबे की ‘फैसला’ तथा भगीरथ की ‘ओवरटाइम’ थीं। इन सभी लघुकथाओं का मंचन भगीरथ के मुख्य निर्देशन में अरविंद श्रीवास्तव, चं प्र दायमा, श्याम विजय, वरुण परिहार, कु राज गुप्ता, लालबचन, कैलाश टेलर, हंसराज चौधरी एवं रमेश जैन द्वारा किया गया।
राजस्थान के बाद बिहार के धनबाद वरांची तथा हरियाणा के सिरसा में भी लघुकथा-मंचन का कार्य हुआ। मध्य प्रदेश(घरघोड़ा-रामगढ़) की सांस्कृतिक संस्था ने भी इसीप्रकार का एक आयोजन किया जिसमें देश के कुछ अन्य कथाकारों के साथ प्रदेश के महेन्द्र सिंह महलान की लघुकथा ‘पहचान’ का मंचन किया गया।
(शेष आगामी अंक में…)
लघुकथाएँ
बुढ़ापे का सहारा
डॉ रामकुमार घोटड़
माँ रोए जा रही थी और पापा अभी ड्यूटी से नहीं लौट पाये थे।
“सोनू बिटिया, क्या कर लिया यह! मैं सब्जी लेने बाजार गई थी कि पलभर में यह सब हो गया। अपने छोटे भैया मोनू को बचाने के लिए तुमने अपना ध्यान ही नहीं रखा? बेटी, हमने तुम्हें फूलों की तरह पाला है, सहेजा है। तू हमारे आँगन की तुलसी है…तो क्या भगवान ने हमें कन्यादान करने का सौभाग्य ही नहीं दिया?…क्या किया तुमने यह…आखिर क्यों?…”
“मम्मी…! मोनू सो रहा था। अचानक न जाने कमरे में कैसे आग लग गई!! मोनू की चीख सुनकर जब मैं भागी, तब तक आग पूरे कमरे में फैल चुकी थी। जल्दी ही अन्दर घुसकर मैंने मोनू को बाहर की ओर धकेल दिया और लपटों ने मुझे घेर लिया…मैं बाहर न आ सकी। चीखें सुनकर जब पड़ोसी पहुँचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी…मम्मी, आप तो हमेशा कहा करती हैं कि मोनू हमारे बुढ़ापे का सहारा है…मैं तो एक लड़की हूँ, पराया धन…एक न एक दिन मुझे आपसे विदा लेनी ही थी—अगर मम्मी, मोनू को कुछ हो जाता तो आपके बुढ़ापे का सहारा कौन होता?…” कहते-कहते वह शान्त हो गई और निस्तब्ध वातावरण को एक माँ की चीख ने कम्पायमान कर दिया।
बेटी का रोल
महेन्द्रसिंह महलान
बिंदिया खुश थी। बड़े बजट की फिल्म में एक छोटा-सा रोल जो मिल गया था उसे।
फिल्म अपार सफलता के साथ शहर में प्रदर्शित हुई। बिंदिया के घर मिलने-जुलने व बधाई देने वालों का ताँता बँध गया।
उसने अपने अनपढ़ और भोले-भाले पिता से फिल्म देखने का आग्रह किया। पिता बेटी की सफलता पर फूला नहीं समा रहा था। वह प्रसन्नता एवं गर्व के साथ बेटी के संग सिनेमा पहुँचा।
‘शो’ खत्म होने को आया। पिता व्यग्रतापूर्वक पूछ बैठा,“बेटी, तुम्हारा रोल कब आएगा…?”
तभी पर्दे पर एक बलात्कार-दृश्य उभरकर आया। कोई बदमाश किसी लड़की को हिंसक जानवर की भाँति नोंच-खसोट रहा था। लड़की के सभी वस्त्र फट गए थे और उसके सभी सुडौल अंग बाहर झाँकने लगे थे। बिंदिया खुशी से चिल्लाई,“बाबा, ये ही है…ये ही है मेरा रोल…कितना रियल, कितना नेचुरल बन पड़ा है! देखो तो…”
मगर बाबा न तो देख रहा था और न ही सुन रहा था। वह तो सिर्फ बेटी के चेहरे की ओर ताक रहा था।
रिश्ता
रत्नकुमार साँभरिया
प्रशासनिक सेवा में चयन हो जाने के बाद वह पहली बार अपने छोटे भाई राजदीप से मिलने के लिए गाँव से शहर आया था। फटी और उधड़ी कमीज, छोटी-सी एकलाँघी धोती, सिर पर मैला-कुचैला अँगोछा और पाँवों में टूटी चप्पलें। राजदीप ने जब अपने बड़े भैया को फटेहाल देखा तो उसे अपने आप पर ग्लानि हुई।
वह मन-ही-मन सोचने लगा—यह वही मेरे मसीहा भाई हैं, जिन्होंने दिन-रात मेहनत-मजदूरी करके मुझे पढ़ाया है, लिखाया है और नौकरी के काबिल बनाया है। कर्जा आज तक भी सिर पर है इनके।
दूसरे दिन, जब वह घर जाने लगा तो राजदीप ने अटैची खोलकर उसमें से अपने पुराने कुर्ता-कमीज निकालकर बाहर रख दिए। उसने अपनी पत्नी से सहज ही पूछ लिया—“भैया के पास कपड़े नहीं हैं, ये पुराने कुर्ता-कमीज हैं, दे देता हूँ।”
“सारा घर ही उठाकर दे दो न भैया को!…जब चाहेंगे, आ बैठेंगे। मत लगाओ मुँह।” वह तुनक उठी।
“लेकिन, फटे कपड़ों में इनका बदन दिखता है। शर्म आती है मुझे कि मैं इतना बड़ा अधिकारी हूँ और मेरे यह भाई हैं, जिनके तन पर पूरे कपड़े भी नहीं हैं।”
“जब कपड़े नहीं थे तो यहाँ आये ही क्यों? इनको इतना भी मालूम नहीं कि किसके घर कैसे जाया-आया जाता है?”
“ये कपड़े पुराने ही तो हैं, दे देते हैं भैया को।” राजदीप ने आग्रहपूर्वक कहा।
उसकी पत्नी होंठ बिचकाकर बोली,“रामू ने कितनी बार कहा है—बीबीजी, साब के पुराने कपड़े पड़े हों तो दे दो मुझे, मेरे कपड़े फट गए हैं। अगर उसे दे देंगे तो हाथ बढ़ा-बढ़ाकर काम करेगा। आखिर नौकर है अपना।”
उसने कपड़े अपनी बगल में दबाए और उन्हें रखने के लिए दूसरे कमरे की ओर बढ़ गई।
सम्मान
दुर्गेश
“क्यों भाई, तुम यहाँ क्यों खड़े हो?”
“हम अपने आदमी के पास आए हैं, तुम कौन होते हो पूछने वाले?”
“लेकिन तुम्हारे आने का फायदा क्या हुआ?”
“कैसे नहीं हुआ? हम इसके सम्मान में आए हैं।”
“सम्मान! यह कैसा सम्मान? यह तो बीमारी और भूख से जूझ रहा है और तुम सम्मान की बात कर रहे हो! पहले इसके लिए दवा और रोटी का प्रबंध करो। सम्मान तो बाद की बात है।”
“चुप रहो, बदतमीज! तुम्हें पता है, यह कौन हैं? यह हैं हमारे देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीबज्र। अगर हम इनके कष्ट मिटा देंगे तो इन्हें कल्पना कैसे सूझेगी? कष्टों में ही तो लेखक की लेखनी में चमत्कार आता है। भोगा हुआ कष्ट ही तो साहित्य की मूल प्रेरणा है। क्या इनके लिए दवा-रोटी का प्रबंध करना एक साहित्यिक व्यक्तित्व को कुंठित करना नहीं होगा?”
प्रणय
पुष्पलता कश्यप
जब वह ताड़ी चढ़ाकर देर रात गए घर लौटता, उसकी गुलबिया लालटेन के टिमटिमाते उजास में गठरी-सी बनी, उनींदी, इंतजार में देहरी पर बैठी-पसरी मिलती। किसी तरह थोड़ा-बहुत खाने के बाद नशे में जाग उठता उसकी हवस का पशु! वह उसे ‘गुलाब’ की तरह उठा अपने सीने में भीच लेता। सूँघता, चूमता-चाटता और पंखुरियों की परत-दर-परत उघाड़कर देखता-मसलता-भोगता। झोंक में मरमराता जाता—मेरी रानी!…मेरे दिल के आमलेट!…और भी न जाने क्या-क्या कितना-कुछ। वह सब गुलबिया को कुछ समझ नहीं पड़ता।
सुबह उठता तो उसका नशा उतर चुका होता और खुमारी का अवशेष—सिरदर्द बचा रहता। गुलबिया को अस्त-व्यस्त, विकृत अवस्था में देखकर उसे चिढ़ हो जाती।
“देखो, दिन चढ़े तक महारानीजी कैसी लुढ़की-उथली पड़ी हैं, जैसे बाप से कोई रियासत पट्टे पर चढ़ाकर साथ लाई हो।” कहते हुए एक लात जमा देता—“निर्लज्ज-बेहया-फूहड़, चल उठ! सूरज सर पर आ गया है और मलकाजी अभी तक सो रही हैं!…”
और नोंक-झोंक, तू-तड़ाक से एक और दिन की शुरूआत हो जाती।
चपत-चपाती
अंजना अनिल
कक्षा पाँच।
हिन्दी का पीरियड।
“चपाती पर कुछ पंक्तियाँ कहो।” मास्टर साहब बोले।
कई हाथ एक साथ उठ खड़े हुए, मगर उमेश निर्जीव-सा बैठा रहा।
“नालायक! एक तू ही है जिसे कुछ नहीं आता…खड़ा हो और बता।”
उमेश बेबस-सा उठा और नीची निगाहें किए बोल उठा—“मास्साब! माँ बीमार है…बरतन माँजने नहीं जा सकी…पैसे नहीं आए…आटा नहीं था। चपाती नहीं बनी…” बोलते-बोलते उमेश रुआँसा हो उठा।
लड़के हँसने लगे।
“चुप्…बहुत हो चुका…बैठ जा!” मास्टर साहब ने तड़-से उसे एक चपत पिला दी।
राधा नाचेगी
गोविन्द गौड़
लड़की की शादी कर देने के बाद उसका परिवार आर्थिक-तंगी महसूस करने लगा था। परिवार का मुखिया स्वयं ही तो था—एकमात्र कमाने वाला। लड़की की शादी से पहले सब अपनी पसंद का खाते-पहनते थे; लेकिन अब वह स्वतन्त्रता कर्जे के कारण उनसे छिन गई थी। बच्चे लोग मुँह फुलाए रहने लगे थे। यहाँ तक कि उसकी पत्नी स्वयं भी स्थिति को समझे बिना बच्चों के अभावों को बार-बार गिनाने लगी थी।
उसने स्वयं अपने परिश्रम से अपने परिवार के लिए सब सामान्य सुविधाओं का जुगाड़ किया था। कुछ ज्यादा ही स्वाभिमानी होने के कारण, पैतृक-सम्पत्ति में से उसने कुछ नहीं लिया। कुछ अचल सम्पत्ति उसके नाम, उसके पिता ने कर भी दी तो भाइयों ने कब्जा कर लिया। तिस पर ॠण-स्वरूप भी उसे उन लोगों से सहयोग नहीं मिला था। सरकारी नौकरी में अध्यापक के पद पर था वह। वह जानता था कि इस तनावपूर्ण स्थिति के लिए उसकी पत्नी जिम्मेदार है; क्योंकि उसने बच्चों को मानसिक रूप से अभावग्रस्त-स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं किया था।
एक दिन यह काम उसने स्वयं कर डाला। पत्नी समेत बच्चों को अपने पास बिठाया और उन्हें समझाने का प्रयास किया कि देखो, यह आर्थिक-तंगी सामयिक है। दो-एक साल बाद लड़के की शादी करेंगे ही। कुछ-न-कुछ भरपाई तो हो ही जाएगी। मेरे रिटायरमेंट में भी पाँचेक साल ही बाकी हैं। कम्यूटेड पेंशन, जी पी एफ, स्टेट इंश्योरेंस ग्रेच्युयटी, लीव इनकैशमेंट आदि मिलाकर कोई तीन लाख तो मिल ही जाएगा। तुम लोग असहाय नहीं हो। खुदा-न-खास्ता नौकरी में रहते हुए, किसी कारण मैं चल बसता हूँ तो दो लाख तक की सहायता-राशि अलग मिल सकती है। थोड़ा धैर्य-साहस से काम लो। वक्त हमेशा एक-सा थोड़े न रहता है।
और वह आश्वस्त हो लिया था—अब सब सहज हो जाएगा।
लेकिन नहीं। यह जानकर अफसोस होना स्वाभाविक है कि स्थिति अब और-जटिल हो गई थी। अब तो परिवार ही संवाद-शून्य हो गया था। जमाना बदला है, और इस बुरी कदर बदला है कि अर्थ ही अब लोगों का माई-बाप हो गया है। लोग संवेदन-शून्य हो गये हैं। अपने बड़े बेटे, जिसकी धमनियों में उसका अपना खून बह रहा है, के मुँह से यह सुनकर तो उसके पैरों-तले की जमीन ही खिसक गई कि यह बुड्ढा मरे तो ही मेरे सपने साकार हो सकते हैं। मैं कैसे इंजीनियरिंग में दाखिला ले सकूँगा? दो लाख तो डोनेशन ही देने पड़ जाएँगे। न तो मण तेल होगा न राधा नाचेगी।
क्लास लेने के बाद वह स्टाफ-रूम में आकर कुर्सी में धसक गया। नाचेगी बेटे, राधा नाचेगी—वह बुदबुदाया और उसके सीने ने धड़कना बंद कर दिया।
समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार सूर्यकांत नागर
(गतांकसेआगे) अन्य लघुकथाकार, जिनका उल्लेख जरूरी लगता है, वे हैं—कृष्ण्कान्त दुबे, संजय कुमार डागा(हातोद), सुरेश बजाज, डॉ तेजपाल सिंह सोढ़ी, सिंघई सुभाष जैन, वीरचन्द नरवाले, सत्यनारायण पटेल, रमेश जाधव, कान्तिलाल ठाकरे, राज केसरवानी, मधुकर पँवार, महेश भण्डारी आदि। डॉ सोढ़ी का सन 2005 में लघुकथा संकलन ‘महामानव’ आया है। कृष्णकान्त दुबे ने प्रकृति और ग्रामीण परिवेश को लेकर अच्छी लघुकथाएँ लिखी हैं। डॉ रमेशचन्द्र दुबे का अलग से उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि उन्होंने भी लघुकथा विधा के संवर्धन हेतु बहुत काम किया है। ‘आस्था’ उनकी एक अविस्मरणीय लघुकथा है। व्यंग्यकार से एक जागरूक कवि का चोला पहन लेने वाले ब्रजेश कानूनगो ने यद्यपि कम ही लघुकथाएँ लिखी हैं, लेकिन जो भी लिखी हैं, वे उन्हें एक समर्थ लघुकथाकार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। घुलती पृथ्वी, रंग-बिरंग आदि उनकी महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं। मालवा-अंचल की महिला लघुकथाकारों में ध्यान आकर्षित करने वाले नाम हैं—चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, लीला रूपायन, कृष्णा अग्निहोत्री, सीमा पाण्डे ‘सुशी’, रेखा कारड़ा, सुनयना वोरा, सुमति देशपाण्डे, डॉ पुष्पारानी गर्ग, स्वाति तिवारी(सभी इंदौर), प्रज्ञा पाठक और मीरा जैन(दोनों उज्जैन)। इनमें भी चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, सीमा पाण्डे, मीरा जैन और प्रज्ञा पाठक अधिक सक्रिय हैं। रेखा कारड़ा शारीरिक रूप से अशक्त होते हुए भी मानसिक रूप से काफी सशक्त हैं। साहित्य और कला के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। ‘उसका सपना’(2005) रेखाजी का लघुकथा-संग्रह है। प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाली अंतरा करवड़े ने बहुत ही खूबसूरत लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके लघुकथा-संग्रह ‘देन उसकी हमारे लिए’ को अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’ रजत अलंकरण मिल चुका है। सीमा पाण्डे ‘सुशी’ और अंतराजी इंटरनेट पर भी बहुत सक्रिय हैं। चेतना भाटी की उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं—हेलमेट, ऊँची जाति, मंजर आदि। मीरा जैन की अब तक सौ से अधिक लघुकथाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कई अन्य लघुकथा-संकलनों में भि वे संकलित हैं। ‘मीरा जैन की सौ लघुकथाएँ’ उनका एकल लघुकथा-संग्रह है। लघुकथा-लेखिकाओं की अधिकांश लघुकथाएँ परिवेशजन्य हैं। घर-परिवार, नाते-रिश्तों को शायद पूरी तरह छोड़ पाना उनके लिए संभव नहीं है। इसीलिए उनकी रचनाओं में अनुभूति की प्रामाणिकता है। प्रश्न यही है कि जो एक स्त्री अपने जीवन में झेलती-भोगती है, उसे पुरुष तो क्या, वह स्त्री जिसने वह-सब भोगा नहीं है, ठीक-से बयान नहीं कर सकती। उज्जैन का जिक्र आया है तो वहाँ के पुरुष-लघुकथाकारों को भी याद कर लिया जाए। पोलियोग्रस्त स्व0 अरविन्द नीमा विकलांग होते हुए भी विचित्र जिजीविषा के धनी थे। लिखने-पढ़ने में उनकी गहरी रुचि थी। अच्छी रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया भेजना वे कभी नहीं भूलते थे। उनका एक लघुकथा-संग्रह ‘गागर में सागर’ उनकी मृत्यु के पश्चात सन 2000 में प्रकाशित हुआ था। उज्जैन के ही सन्तोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर ‘निरन्तर’, मुकेश जोशी, शैलेन्द्र पाराशर, स्वामीनाथ पाण्डेय, डॉ शैलेन्द्र कुमार शर्मा, भगीरथ बड़ोले, बी0 एल0 आच्छा, डॉ प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट और श्रीराम दवे आदि अनेक रचनाकार लघुकथा-विधा से जुड़े हैं। ख्यात व्यंग्यकवि ओम व्यास ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मजदूरी’ उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है। डॉ प्रभाकर शर्मा का संकलन ‘सागर के मोती’(2004) चर्चित रहा है। लेखक, पत्रकार, चिंतक श्रीराम दवे ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके संपादन में इंदौर के तीन लघुकथाकारों का संकलन ‘त्रिवेणी’(2003) आया था। प्रो0 शैलेन्द्र पाराशर के संपादन में लघुकथाओं के संकलन ‘सरोकार’ का प्रकाशन उज्जैन से हुआ था। संकलन में रमेशचन्द्र शर्मा, हरीश कुमार, प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट, प्रवीण देवलेकर आदि की लघुकथाएँ शामिल थीं। उक्त संकलन का भव्य लोकार्पण-समारोह हुआ था जिसमें सांसद सत्यनारायण जटिया, ख्यात कवि-आलोचक प्रमोद त्रिवेदी, प्रो0 रमेश गुप्त ‘चातक’ आदि अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। उक्त संकलन का लोकार्पण सूर्यकांत नागर ने किया था। इस अवसर पर लघुकथाकार वेद हिमांशु को सम्मानित भी किया गया था। प्रो0 बी0 एल0 आच्छा ने लघुकथा के सिध्दान्त-पक्ष पर अनेक विचारपरक लेख लिखे हैं। पिलकेन्द्र अरोरा भी इस दिशा में काफी सक्रिय हैं। लेखक, कवि, विचारक और वरिष्ठ विज्ञानी रतलाम के डॉ जयकुमार जलज ने हिसाब, हासिल, नेता-शिष्य, वंशबेल, झूठा सच, शॉर्टकट जैसी यादगार कथाएँ लिखकर सिद्ध कर दिया है कि उनकी इस विधा पर गहरी पकड़ है। उनकी लघुकथाओं में मनुष्य के दोहरे चेहरे और स्खलित होते मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी चिन्ता को रेखांकित किया जा सकता है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में सतत लिखने वाले झाबुआ के रामशंकर ‘चंचल’ भी अब तक अनेक श्रेष्ठ लघुकथाएँ लिख चुके हैं। उनकी रचनाएँ देशभर की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। उनके द्वारा संपादित ‘एकलव्य’(2004) संकलन में उनकी अनेक लघुकथाएँ संकलित हैं। उनकी झीतरा और ब्लाउज रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अशोक ‘आनन’(मक्सी) ‘आयाम’ लघु-पत्रिका निकालते रहे हैं। इस पत्रिका का एक पूरा अंक लघुकथा को समर्पित था। ‘आनन’ ने स्वयं भी अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मातुश्री कमलादेवी स्मृति पुरस्कार’ का प्रोत्साहन पुरस्कार भी उनको मिल चुका है। ‘खिलौने’ उनकी उल्लेखनीय लघुकथा है। देवास के उपेन्द्र मिश्र एवं नितिन घुणे के समर्पण-भाव को याद रखना भी जरूरी है। इंदौर में रहे और मुंबई में जा बसे अनन्त श्रीमाली ने सतीश राठी के साथ मिलकर लघुकथा के संवर्धन के लिए खूब काम किया। राठीजी के साथ वे ‘क्षितिज’ और ‘मनोबल’ के सहयोगी संपादक रहे। इंदौर के एक और लघुकथाकार जो फिलहाल नौकरी के सिलसिले में मुंबई में हैं, वे हैं—डॉ सतीश शुक्ल। शुक्लजी भी लघुकथा के प्रति समर्पित रहे हैं। कर्ज-अदायगी तथा स्वाभिंमान जैसी लघुकथाओं के माध्यम से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। मालवा-अंचल के देवास, उज्जैन, इंदौर आदि स्थानों पर लघुकथा-सम्मेलनों, सेमीनारों, कार्यशालाओं, लोकार्पण-समारोहों और चर्चा-गोष्ठियों का आयोजन अक्सर होता रहता है। इनमें लघुकथा लेखन के विविध पक्षों पर खुली चर्चा होती है। कुछ स्थानों पर लघुकथाओं पर आधारित चित्र-प्रदर्शनियाँ भी लगाई जा चुकी हैं। दिल्ली निवासी मधुदीप के लघुकथा-संग्रह ‘मेरी बात तेरी बात’ पर स्वयं मधुदीप की उपस्थिति में इंदौर में विस्तृत चर्चा हुई थी। चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ पर भी एकाधिक बार बहस हो चुकी है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति द्वारा भी लघुकथा-वाचन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। गत वर्ष डॉ सतीश दुबे की लघुकथाओं के गुजराती संकलन ‘करोड़ रज्जू’ का वृहद लोकार्पण-समारोह गुजराती समाज द्वारा आयोजित किया गया था। गुजरात साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित और कभी इंदौर में ही रहे रोहित श्याम चतुर्वेदी द्वारा हिन्दी से गुजराती में अनूदित यह पुस्तक काफी चर्चित रही। सतीश राठी ने ‘क्षितिज’ के लिए 1983-84 में लघुकथा-प्रतियोगिता आयोजित कि थी जिसमें फजल इमाम मलिक, मदन शर्मा और शंकर पुणतांबेकर को पुरस्कृत किया गया था। निर्णायक थे—निमाड़ लोक संस्कृति के पोषक रामनारायण उपाध्याय, सूर्यकांत नागर और राजेन्द्र पाण्डेय। अशोक शर्मा ‘भारती’ द्वारा आयोजित प्रतियोगिता का उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति की मुख-पत्रिका ‘वीणा’ में आज भी लघुकथाओं का प्रकाशन नियमित रूप से हो रहा है। लघुकथा पर क्षेत्र के अनेक छात्र-छात्राओं द्वारा एम फिल हेतु लघु शोध-प्रबन्ध तथा पी-एच डी हेतु शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत कर डिग्रियाँ हासिल की गई हैं। इनमें कुछ नाम हैं—सुनीता पाटीदार, संजय गुप्ता, पल्लवी, भारती ललवानी, मनीषा व्यास आदि। देश में लघुकथा के बदलते नक्शे के साथ-साथ मालवांचल में भी लघुकथा लेखन में भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर बदलाव आया है। हृदयहीनता, भ्रष्टाचार और परस्पर विरोधी स्थितियों वाले घिसे-पिटे विषयों से मुक्ति मिल रही है। अतिरिक्त स्पष्टीकरण और विवरणात्मकता के प्रति भी लेखक-वर्ग सावधान हुआ है। बदलते यथार्थ को सामने लाने के लिए लघुकथा के रचनात्मक स्वरूप में रूपात्मक बदलाव आया है। पहले लगता था, सारी लघुकथाएँ एक ही टकसाल से निकलकर आ रही हैं। अब मालवा का लघुकथाकार अधिक सजग हुआ है। उसने लघुकथा के बने-बनाए ढाँचे को तोड़ने की कोशिश की है। उसकी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समझ विकसित हुई है। लघुकथा के विकास की दृष्टि से यह एक शुभ लक्षण है। विक्रम सोनी, सतीश दुबे से प्रारम्भ परम्परा विकसित-पल्लवित होकर नए रंग-रूप में अपनी सुरभि बिखेर रही है और लघुकथा विधा के संवर्धन में अपना विनम्र योगदान कर रही है। निस्सन्देह मालवा-अंचल के लघुकथाकारों ने साहित्य कोष को समृद्ध करने और लघुकथा को अधिकाधिक लोगों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उम्मीद है, अंचल की नई प्रतिभाएँ भी आगे आएँगी और इस विधा की जड़ों को मजबूत करने में भरपूर सहयोग करेंगी। मोबाइल:09893810050
लघुकथाएँ
लक्ष्मी-निवास सुरेशशर्मा
दीपावली की आधी रात बीत चुकी थी। लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार उपयुक्त पात्र को वरदान देने निकल पड़ीं। एक झोपड़ी का दरवाजा बन्द था। भीतर-बाहर अँधेरा पसरा देखकर विस्मय के साथ लक्ष्मीजी ने पूछा, “दीवाली की रात भी अँधेरा?” “यह एक गरीब मजदूर का घर है। दिनभर कठोर श्रम करने के बाद भी इसके परिवार का गुजारा नहीं हो पाता। इसीलिए आपका स्वागत नहीं कर पाया बेचारा।” उल्लू ने स्थिति स्पष्ट की तो लक्ष्मीजी ने आगे बढ़ने का इशारा किया। कुछ दूर चलने के बाद एक घर के आगे केवल एक दीया टिमटिमाता हुआ देखकर वे ठिठकीं। आशय समझकर उल्लू बोला,“यह एक ईमानदार शासकीय कर्मचारी का घर है। ऊपर की कमाई को हाथ लगाना भी पाप समझता है। इसीलिए इसका परिवार गरीबी और अभाव से त्रस्त रहता है। अपनी क्षमता अनुसार ही आपकी सेवा कर सन्तुष्ट है, देवि!” लक्ष्मीजी की खामोशी का अर्थ समझकर उल्लू आगे बढ़ लिया। तभी उनकी नजर विद्युत रोशनी से जगमगाते एक भव्य भवन पर पड़ी। वहाँ आतिशबाजी से आसमान तक गूँज रहा था। दर्जनों देशी-विदेशी कारों की लाइन लगी हुई थी। अच्छा-खासा शोर मचा हुआ था। लक्ष्मीजी को खोया हुआ-सा जानकर उल्लू बताने लगा, “यह एक हवाला और घोटालेबाज का महल है देवि! इसके पास अपार सम्पत्ति व काला धन है।” सुनकर लक्ष्मीजी बोलीं, “तुम मुझे यहीं उतार दो।” उल्लू उल्लू-सा खड़ा-खड़ा लक्ष्मीजी को भीतर जाते देखता रहा। मोबाइल:09926080810
संस्कार श्यामसुन्दर व्यास (निधन: 03 अक्तूबर, 2007)
सार्वजनिक नल पर पानी भरने वालों की भीड़ जमा हो गई थी। हंडा भर जाने के बाद बूढ़ी अम्मा से हंडा उठाया नहीं जा रहा था। लोगों का अधैर्य बड़बड़ाहट में बदलने लगा। मनकू ने हंडा हटाकर अपनी बाल्टी लगाते हुए बूढ़ी से कहा, “बहू को मेंहदी लगी है क्या, जो तू आ गई?” कातर स्वर में बूढ़ी के बोल फूटे—“उसका पाँव भारी है।” मनकू को लगा जैसे किसी ने उस पर घड़ों पानी डाल दिया हो। उसने हंडा उठाया और बूढ़ी अम्मा के द्वार पर रख आया।
मूल्यान्तर विक्रमसोनी
दरोगाजी प्याऊ के आगे अंजुरी बाँधते उसे देखकर बेहद आत्मीयता व नम्रता से बोले,“क्यों बे हरामी की औलाद अहीरराम, तूने अभी तक एक टीन घी नहीं पहुँचाया? एक तेरे ही घर का हुआ तो हम खाते-पीते हैं। गाँव में एक तेरे ही घर की किसी चीज से हमें परहेज नहीं है, और तू है कि…” “तीन गायें मर गयीं हुजूर।” “अबे तो गाँवभर में सौ-सौ ग्राम भी माँग लिया होता तो टीन भर जाता। देखता, कौन साला हमारे नाम से नहीं देता!” वह कुछ उत्तर देता, तभी पानी पिलाने वाली बुढ़िया ने धीरे-से कहा,“माँगकर ला देना बेटा, भिखारी को जूठन से परहेज नहीं होता।” सम्पर्क:0734-2533910
हक़कीमजदूरी प्रतापसिंहसोढ़ी
अपने पाँच-वर्षीय बच्चे का हाथ पकड़े भूरीबाई दाड़की पाने की प्रतीक्षा में लगभग दो घण्टे से मजदूर-चौक में खड़ी हुई थी। उसने मजदूरी मिलने की आस अब छोड़ दी थी। सुस्ताने के लिए वह पास की पुलिया पर बैठ गयी। तभी, उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी,“क्या काम नहीं मिला?” उसने देखा कि एक नौजवान अपनी पतली नुकीली मूँछों पर उँगली फेरते हुए उसे घूर रहा था। संक्षिप्त-सा उत्तर दिया उसने—“नहीं मिला।” “हम देंगे तुम्हें बढ़िया काम।” “क्या मजदूरी दोगे?” कमीज की कॉलर ऊपर उठाते हुए उसने कहा, “मुँहमाँगी मजदूरी मिलेगी।” उसे घूरते हुए दृढ़तापूर्वक वह बोली, “हक़ की मजदूरी ही लूँगी। कहाँ जाना होगा?” कुटिल हँसी बिखेरते हुए उस नौजवान ने उत्तर दिया, “मेरे ठिकाने पर चलना होगा, जहाँ सभी मजदूरिनें जाती हैं। वहाँ सभी सुविधाएँ हैं। दो-तीन घण्टे में तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी और भरपूर मजदूरी भी।” अनपढ़ भूरीबाई सब-कुछ समझ गई। उसकी भृकुटी तन गई और पूरी ताकत लगा वह चीख पड़ी, “अबे हरामी, मैं मजदूरी कर पेट भरती हूँ, इज्जत बेचकर नहीं। भाग जा यहाँ से, नहीं तो…।” एक बड़ा-सा पत्थर उसके हाथ में था। भूरीबाई के इस विकराल रूप को देखकर वह नौजवान भयभीत वहाँ से भाग खड़ा हुआ। भूरीबाई ने अपने बच्चे का हाथ पकड़ा और लम्बे-लम्बे डग भरती, बड़बड़ाती हुई अपने घर की तरफ चल दी। मोबाइल:09753128044
खामोश रमेशमनोहरा
“क्यों लीला, आजकल खामोश क्यों रहने लगी? क्या हो गया, बोल्।” “कुछ नहीं हुआ।” “जो हमेशा दिन-रात बड़बड़ाती रहती थी। अपनी बहू को कम दहेज लाने पर कोसती रहती थी। मगर कुछ दिनों से देख रही हूँ—किसी ने तुम्हारी जुबान सी दी है। बता, बहू ने कुछ कह दिया क्या?” “बहू क्या कहेगी मीरा बहिन्।” “तो फिर किसने कह दिया?” “मेरे अपने बेटे ने।” “क्या कह दिया ऐसा तुम्हारे बेटे ने?” “कह दिया, तुम दहेज के लिए बार-बार बहू को परेशान नहीं करोगी।” “बेटे ने ऐसा कह दिया और तुम डर गई?” “डरे मेरी जूती।” जरा गुस्से से लीला बोली। “तो फिर, इतनी खामोश क्यों रहने लगी? बहू को भी अब दहेज के लिए नहीं उकसाती हो?” “बात दरअसल यह हुई मीरा बहिन, बेटे ने जोर देकर कह दिया—अब दहेज के लिए बहू को परेशान करोगी तो हम दोनों आत्महत्या कर लेंगे।” “और तुम डर गई?” “हाँ मीरा बहिन, बेटा तो मेरा ही है। बहू में आँसू आ गये। “यानी कि बेटा बहू का गुलाम हो गया?” मीरा ने उसके दर्द को फिर कुरेदा। “हाँ मीरा बहिन, मैं अपने को नहीं खोना चाहती।” कहकर लीला ने अपनी वेदना उगल डाली। मीरा बहिन अन्दर-बाहर से मुस्करा दी, क्योंकि यह योजना उसी की थी। सम्पर्क:07414-229414
आशंका डॉयोगेन्द्रनाथशुक्ल
घर के सामने कार रुकने की आवाज़ आते ही पिता छड़ी के सहारे रूम की ओर चल दिए। “बेटा! यात्रा में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?” “नहीं पिताजी।” “कार्यक्रम अच्छी तरह निपट गया?” “जी पिताजी। चाचाजी आपको बहुत याद कर रहे थे…मैंने कह दिया कि आपकी तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए नहीं आ सके।” “बेटा, तुम्हारी चाची बहुत अच्छी महिला थी…तुम्हें तकलीफ तो हुई होगी, लेकिन उनके तेरहवें में शामिल होना बहुत जरूरी था…उनका परिवार भले ही दूसरे शहर में रह रहा हो, पर हमारा खून तो एक ही है…।” यह कहते हुए उनकी आँखें भर आई थीं; किन्तु उन्हें मन ही मन सन्तोष भी था कि पुत्र और पुत्रवधू ने उनकी आज्ञा का पालन किया था। रात को यश उनके कमरे में आया। “दादाजी, पापा कानपुर से मेरे लिए ये वीडियो-गेम लाए हैं।” “यह तो बहुत अच्छा है! जरा मुझे भी बताओ…।” उसके सिर पर हाथ फेरते हुए दादाजी ने कहा। “दादाजी, मम्मी कह रही थी कि चाचीजी की साग-पूड़ी चार हजार में पड़ी।…दादाजी, क्या साग-पूड़ी इतनी मँहगी मिलती है?” यश अपने प्रश्न का जवाब चाह रहा था और दादाजी अपने भावी जीवन के प्रति आशंकित हो मूर्तिवत खड़े थे। सम्पर्क:0731-2483893
कचरा मनोजसेवलकर
प्रतिदिन गली में आने वाली स्वीपर प्रत्येक घर के सामने झाड़ू लगाते हुए अपना निर्धारित वाक्य दोहराती—“आंटीजी, कचरा्।” तथा प्रत्येक घर उसका आशय जान उसकी हाथ-ट्राली में कचरा डाल देते। परन्तु मेरे पड़ोस में जब भी वह आती, तब उसके वाक्य में परिवर्तन हो जाता। कहती—“दादाजी, कचरा।” क्योंकि दादाजी प्रतिदिन उसी समय अपने घर के आँगन तथा आसपास की सफाई कर कचरा डस्टबिन में डालते, फिर उस स्वीपर की हाथ-ट्राली में। आज भी दादाजी व्यस्त थे तथा उनकी बहू दरोगा की माफिक बरामदे में खड़ी अपने ससुरजी की गतिविधियों को देख रही थी। जैसे ही स्वीपर ने “दादाजी, कचरा” कहा, वैसे ही उन्होंने उससे प्रश्न किया—“तुम मुझे इस ट्राली में कहाँ डालोगी?” स्वीपर ने कहा—“क्यों मजाक करते हैं दादाजी!” “तुम ही तो रोज कहती हो—दादाजी कचरा!” “वो तो दादाजी, मैं कचरा माँगती हूँ।” “नहीं बेटा, मैं तो अब रोज कचरा होता जा रहा हूँ…।” दादाजी की बात को वह तो हँसी-ठिठोली समझकर आगे बढ़ गई। बहू उनके आशय को समझ नाराजगी प्रकट करती, पैर पटकती घर के अन्दर चली गई। सम्पर्क:0731-2484321
कथायात्रा के माध्यम से मैं अपनी पूर्व-प्रकाशित व अप्रकाशित दोनों तरह की लघुकथाओं एवं 'लघुकथा-वार्ता' के माध्यम से तत्सम्बंधी लेखों के साथ आपके समक्ष हूँ। कृपया इन लघुकथाओं व लेखों पर अपनी टिप्पणी देते रहने का प्रयास अवश्य करते रहें।
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